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राजनीति

‘पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा’: PIB ने PM मोदी का एडिटेड वीडियो किया फैक्ट चेक, जंतर-मंतर प्रदर्शनकारियों को धमकी देने का दावा फर्जी

प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) की फैक्ट चेक यूनिट ने सोशल मीडिया पर वायरल उस वीडियो को फर्जी बताया है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कथित तौर पर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे लोगों को धमकी देते दिखाया गया। PIB के अनुसार, वीडियो को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से डिजिटल रूप से बदला गया और प्रधानमंत्री के नाम पर ऐसे बयान जोड़े गए, जो उन्होंने वास्तव में नहीं दिए थे।

‘पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा’: PIB ने PM मोदी का एडिटेड वीडियो किया फैक्ट चेक, जंतर-मंतर प्रदर्शनकारियों को धमकी देने का दावा फर्जी
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द्वारा जीत निर्मल

स्रोत: जनता स्कोप

PM मोदी का वायरल वीडियो फर्जी: PIB

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक वीडियो को लेकर PIB Fact Check ने स्पष्टीकरण जारी किया है। वायरल क्लिप में ऐसा दिखाने की कोशिश की गई कि प्रधानमंत्री ने दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे लोगों को लेकर धमकी भरी टिप्पणी की है।

PIB Fact Check के मुताबिक, यह वीडियो वास्तविक नहीं है बल्कि AI की मदद से तैयार किया गया डीपफेक है। फैक्ट चेक यूनिट ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने वायरल वीडियो में सुनाई दे रहे विवादित बयान नहीं दिए थे।

PIB ने यह भी कहा कि इस तरह के एडिटेड कंटेंट को उन सोशल मीडिया अकाउंट्स से प्रसारित किया जा रहा था, जिन्हें उसने “पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा अकाउंट्स” बताया है।

वायरल वीडियो में क्या किया गया दावा?

सोशल मीडिया पर शेयर किए गए वीडियो को इस तरह पेश किया गया कि मानो प्रधानमंत्री मोदी ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ सख्त और धमकी भरी टिप्पणी की हो।

लेकिन PIB Fact Check ने इन दावों को खारिज करते हुए वीडियो को डिजिटल रूप से बदला हुआ बताया।

फैक्ट चेक में असली फुटेज की ओर भी ध्यान दिलाया गया, जिससे वायरल एडिटेड वीडियो और वास्तविक सामग्री के बीच अंतर समझा जा सके।

PIB के अनुसार, वायरल क्लिप में प्रधानमंत्री से जोड़े गए विवादित शब्द उनके वास्तविक बयान का हिस्सा नहीं थे।

AI से तैयार किया गया डीपफेक वीडियो

PIB Fact Check के अनुसार, भ्रामक वीडियो बनाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक का इस्तेमाल किया गया।

आज के AI टूल्स किसी व्यक्ति की आवाज, चेहरे के हावभाव और बोलने के तरीके की नकल या उनमें बदलाव कर सकते हैं। इसके जरिए असली वीडियो में ऐसे शब्द या बयान जोड़े जा सकते हैं, जो संबंधित व्यक्ति ने कभी कहे ही नहीं।

राजनीतिक नेताओं और अन्य सार्वजनिक हस्तियों के बड़ी मात्रा में वीडियो ऑनलाइन उपलब्ध होने के कारण उनके फुटेज का इस्तेमाल डीपफेक बनाने के लिए किया जाना एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है।

राजनीतिक घटनाओं के बीच फर्जी वीडियो बड़ी चुनौती

जंतर-मंतर से जुड़े घटनाक्रम को लेकर सोशल मीडिया पर पहले से ही काफी चर्चा रही है। ऐसे माहौल में किसी वरिष्ठ राजनीतिक नेता का सनसनीखेज बयान बताकर शेयर किया गया वीडियो तेजी से वायरल हो सकता है।

कई बार यूजर्स केवल छोटी क्लिप देखकर उसे वास्तविक मान लेते हैं और पूरा भाषण या वीडियो का मूल स्रोत जांचे बिना आगे शेयर कर देते हैं।

ऐसी स्थिति में भ्रामक सामग्री कुछ ही समय में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकती है।

डीपफेक से बढ़ रहा गलत सूचना का खतरा

यह मामला AI के जरिए तैयार होने वाली गलत और भ्रामक सामग्री से जुड़ी बड़ी समस्या की ओर भी ध्यान खींचता है।

पहले वास्तविक दिखने वाले नकली वीडियो तैयार करने के लिए काफी तकनीकी विशेषज्ञता की जरूरत होती थी। लेकिन जनरेटिव AI टूल्स के तेजी से विकास ने इस प्रक्रिया को काफी आसान बना दिया है।

इससे पत्रकारों, फैक्ट-चेकर्स, सरकारों और आम सोशल मीडिया यूजर्स के सामने नई चुनौती पैदा हो रही है।

अब किसी वीडियो का वास्तविक दिखाई देना ही उसकी सत्यता का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

वायरल वीडियो की जांच कैसे करें?

राजनीतिक या सरकारी हस्तियों से जुड़ा कोई सनसनीखेज वीडियो सामने आने पर उसका मूल स्रोत देखना महत्वपूर्ण है।

यूजर्स यह जांच सकते हैं कि संबंधित बयान का पूरा वीडियो आधिकारिक प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है या नहीं। इसके अलावा वीडियो की तारीख, संदर्भ और मूल अपलोड की भी जांच की जा सकती है।

विशेष रूप से किसी छोटे या काटे गए वीडियो क्लिप के आधार पर निष्कर्ष निकालने से पहले पूरे संदर्भ को देखना गलत सूचना से बचने में मदद कर सकता है।

PIB ने शेयर करने से पहले सत्यापन की सलाह दी

PIB Fact Check समय-समय पर सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाले संदिग्ध सरकारी दावों, तस्वीरों और वीडियो को लेकर लोगों को सतर्क करता रहा है।

ऐसे मामलों में यूजर्स को किसी सनसनीखेज सामग्री को तुरंत आगे भेजने के बजाय पहले उसकी विश्वसनीयता की जांच करनी चाहिए।

विशेष रूप से प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों या अन्य वरिष्ठ नेताओं से जुड़े असामान्य या विवादास्पद बयानों की पुष्टि आधिकारिक और विश्वसनीय स्रोतों से करना महत्वपूर्ण है।

संतुलित विश्लेषण

PIB Fact Check के स्पष्टीकरण के अनुसार, वायरल वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जोड़े गए विवादित बयान वास्तविक नहीं थे और वीडियो को AI की मदद से बदला गया था।

वहीं, वीडियो के प्रसार से जुड़े स्रोतों के बारे में सावधानी से रिपोर्ट करना भी जरूरी है। PIB ने ऐसे कंटेंट प्रसारित करने वाले कुछ अकाउंट्स को “पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा अकाउंट्स” बताया है। इसलिए इस पहचान को PIB के दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

इस मामले का व्यापक पहलू किसी एक वायरल वीडियो से कहीं बड़ा है।

AI आधारित डीपफेक तकनीक वास्तविक फुटेज और मौजूदा राजनीतिक विवादों का इस्तेमाल करके गलत जानकारी को विश्वसनीय रूप दे सकती है। जैसे-जैसे सिंथेटिक वीडियो और ऑडियो अधिक वास्तविक दिखने लगेंगे, किसी सामग्री की सत्यता जांचने के लिए उसके मूल स्रोत तक पहुंचना और प्रमाणित रिकॉर्डिंग से तुलना करना अधिक महत्वपूर्ण होता जाएगा।

यह घटना एक बार फिर बताती है कि सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले राजनीतिक वीडियो—खासकर बेहद सनसनीखेज या विवादित बयान वाले वीडियो—को बिना सत्यापन के वास्तविक नहीं मानना चाहिए।


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