यमुना के पानी में हिस्सेदारी का दावा
पहले प्रस्ताव में पंजाब ने यमुना के पानी पर अपना ऐतिहासिक और कानूनी दावा दोहराया। प्रस्ताव का तर्क है कि 1966 के पुनर्गठन से पहले यमुना अविभाजित पंजाब से होकर बहती थी। इसके बावजूद पुनर्गठन के दौरान रावी और ब्यास के पानी पर विचार हुआ, लेकिन यमुना में पंजाब की हिस्सेदारी निर्धारित नहीं की गई।
राज्य ने 25 अप्रैल 2025 को केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय से जल विवाद न्यायाधिकरण गठित करने की माँग की थी। विधानसभा ने इस दावे को आगे बढ़ाने पर जोर दिया। सरकार इसे सिंचाई के लिए भूजल पर निर्भरता घटाने से जोड़ रही है।
तीन हेडवर्क्स पर पंजाब के नियंत्रण की माँग
दूसरे प्रस्ताव में रोपड़, हरिके और फिरोजपुर के सिंचाई हेडवर्क्स का प्रशासन, रखरखाव और संचालन पंजाब के नियंत्रण में रखने की माँग उठाई गई। हेडवर्क्स वे संरचनाएँ हैं, जिनसे नदी का पानी नियंत्रित करके नहरों की ओर भेजा जाता है।
प्रस्ताव ने पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 की धारा 79(1)(सी) पर आपत्ति जताई, जिसके तहत इन हेडवर्क्स का नियंत्रण बोर्ड को सौंपने का प्रावधान है। राज्य सरकार का तर्क है कि पंजाब की सीमा में मौजूद इन संरचनाओं पर उसका अधिकार होना चाहिए। उसने अन्य राज्यों द्वारा अपने क्षेत्र के हेडवर्क्स संचालित करने का उदाहरण भी दिया।
बाँध सुरक्षा कानून पर संघीय अधिकारों की बहस
तीसरे प्रस्ताव में बाँध सुरक्षा अधिनियम, 2021 को निरस्त करने की माँग दोहराई गई। पंजाब विधानसभा इससे पहले 5 मई 2025 को भी ऐसा प्रस्ताव पारित कर चुकी है। राज्य सरकार का आरोप है कि यह कानून बाँधों और जल प्रबंधन से जुड़े उसके अधिकारों में केंद्रीय हस्तक्षेप बढ़ाता है।
इस विवाद का दूसरा पहलू कानून का घोषित उद्देश्य है। अधिनियम बाँधों की निगरानी, निरीक्षण, संचालन और रखरखाव के जरिए दुर्घटनाओं की रोकथाम का ढाँचा देता है। इसमें राष्ट्रीय तथा राज्य स्तर की संस्थाओं का प्रावधान है। इसलिए विवाद को सुरक्षा की आवश्यकता और अधिकारों के बँटवारे, दोनों संदर्भों में समझना जरूरी है।
राजस्थान से पानी की कीमत और रॉयल्टी
चौथे प्रस्ताव में सतलुज, रावी और ब्यास से राजस्थान को दिए जाने वाले पानी के बदले भुगतान माँगा गया। पंजाब का कहना है कि राजस्थान इस पानी का उपयोग खेती, पेयजल, उद्योग और व्यावसायिक गतिविधियों में करता है, इसलिए उससे संबंधित आर्थिक जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
मुख्यमंत्री भगवंत मान ने सदन में करीब 1.44 लाख करोड़ रुपये की रॉयल्टी का दावा रखा। यह पंजाब सरकार का दावा है; प्रस्ताव से राजस्थान की देनदारी स्वतः निर्धारित नहीं हो जाती। विधानसभा ने केंद्र से पुराने समझौतों के तहत पानी की लागत का प्रश्न सुलझाने और उचित मंचों पर मामला उठाने की बात कही।
रावी के सीमापार बहाव के उपयोग की योजना
पाँचवाँ प्रस्ताव माधोपुर हेडवर्क्स के नीचे रावी में मिलने वाली उज्ज, तरनाह, बसंतर और अन्य धाराओं के पानी से संबंधित है। प्रस्ताव के अनुसार, जम्मू और कश्मीर से आने वाला यह पानी भंडारण या मोड़ने की संरचना के अभाव में पाकिस्तान की ओर बह जाता है।
सदन ने केंद्र से उज्ज बहुउद्देशीय परियोजना को प्राथमिकता देने और उसके पानी को रणजीत सागर बाँध तक पहुँचाने की माँग की। साथ ही केंद्रीय जल आयोग से दूसरी रावी-ब्यास लिंक परियोजना को मंजूरी देने का आग्रह किया गया। उद्देश्य उपलब्ध पानी को पंजाब में संग्रहित करके सिंचाई और अन्य जरूरतों के लिए उपयोग करना है।
सदन का समर्थन और राजनीतिक संदर्भ
प्रस्ताव उपस्थित सदस्यों की सहमति से पारित हुए। उस समय कांग्रेस, भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के अधिकांश विधायक सदन में नहीं थे। हालाँकि, अकाली विधायक मनप्रीत सिंह अयाली और बसपा विधायक नछत्तर पाल मौजूद थे। इसलिए इसे सभी दलों की भागीदारी वाली सर्वसम्मति कहना सटीक नहीं होगा। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले किसानों से जुड़ा यह मुद्दा राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण हो गया है।
प्रस्तावों के बाद आगे क्या होगा?
इन प्रस्तावों से पंजाब की माँगों को औपचारिक राजनीतिक आधार मिला है, लेकिन इनके पारित होने मात्र से जल आवंटन, केंद्रीय कानून या अंतरराज्यीय समझौते नहीं बदल जाते। संविधान की राज्य सूची में जल संबंधी विषय हैं, पर वे अंतरराज्यीय नदियों पर संघ सूची की प्रविष्टि 56 के अधीन भी हैं।
आगे की प्रक्रिया में केंद्र, संबंधित राज्यों और आवश्यकतानुसार न्यायिक संस्थाओं की भूमिका रहेगी। इन प्रस्तावों से निकलने वाला व्यावहारिक निष्कर्ष यही है कि किसानों के लिए वास्तविक परिणाम माँगों पर होने वाले निर्णयों, परियोजनाओं की मंजूरी और खेतों तक पहुँचने वाले पानी से तय होगा।
