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राजनीति

परिसीमन बिल पर सरकार को राहुल गांधी का ‘ना’, कांग्रेस का समर्थन मांगने पहुंचा था केंद्र

केंद्र सरकार ने प्रस्तावित परिसीमन विधेयक पर कांग्रेस का सहयोग हासिल करने के लिए संपर्क बढ़ाया है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से मुलाकात की, लेकिन सूत्रों के मुताबिक राहुल गांधी ने बिल को समर्थन देने से इनकार कर दिया। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब परिसीमन के स्वरूप और राज्यों के प्रतिनिधित्व पर राजनीतिक मतभेद पहले से गहरे हैं।

परिसीमन बिल पर सरकार को राहुल गांधी का ‘ना’, कांग्रेस का समर्थन मांगने पहुंचा था केंद्र
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द्वारा जीत निर्मल

स्रोत: Zee News

राहुल गांधी से सरकार की बातचीत, लेकिन नहीं बनी सहमति

नई दिल्ली: परिसीमन के संवेदनशील मुद्दे पर सरकार और कांग्रेस के बीच राजनीतिक दूरी फिलहाल कम होती दिखाई नहीं दे रही है। केंद्र की ओर से संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से संपर्क कर सहयोग मांगा। रिपोर्टों के अनुसार बातचीत के दौरान परिसीमन विधेयक का मुद्दा भी उठा, लेकिन राहुल गांधी ने प्रस्तावित बिल के लिए कांग्रेस का समर्थन देने से इनकार कर दिया।

सरकार की यह पहल संसद में जारी राजनीतिक गतिरोध के बीच हुई है। रिजिजू विपक्ष के अन्य दलों से भी संपर्क कर संसदीय कामकाज के लिए सहयोग जुटाने की कोशिश कर रहे हैं।

परिसीमन पर पहले से विरोध करती रही है कांग्रेस

कांग्रेस का मौजूदा रुख अचानक सामने नहीं आया है। पार्टी पहले भी प्रस्तावित परिसीमन व्यवस्था को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज करा चुकी है। अप्रैल 2026 में राहुल गांधी ने आरोप लगाया था कि सरकार की योजना केवल महिला प्रतिनिधित्व से जुड़ा कदम नहीं है, बल्कि इससे देश के चुनावी नक्शे और राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में बड़ा बदलाव आ सकता है। सरकार और उसके समर्थकों ने विपक्ष की ऐसी आलोचनाओं को भ्रामक बताते हुए उनका विरोध किया है।

कांग्रेस का कहना रहा है कि वह महिलाओं के लिए आरक्षण के सिद्धांत का समर्थन करती है, लेकिन परिसीमन को उससे जोड़ने के तरीके और इसके लिए इस्तेमाल होने वाले जनसंख्या आंकड़ों पर उसे आपत्ति है। पार्टी ने विशेष रूप से 2011 की जनगणना के आधार पर आगे बढ़ने का विरोध किया है।

आखिर परिसीमन इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

परिसीमन का अर्थ आबादी और अन्य निर्धारित मानकों के आधार पर संसदीय तथा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और प्रतिनिधित्व की व्यवस्था में बदलाव से है। इसलिए यह केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदलने का तकनीकी विषय नहीं है; इससे राज्यों के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व और लोकसभा में शक्ति-संतुलन पर भी असर पड़ सकता है।

यही कारण है कि इस मुद्दे पर राजनीतिक सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण है। खासकर दक्षिणी राज्यों से जुड़े दलों के बीच यह चिंता लंबे समय से उठती रही है कि जनसंख्या को प्रमुख आधार बनाए जाने पर उन राज्यों का सापेक्ष राजनीतिक प्रभाव प्रभावित हो सकता है जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है।

सरकार बना रही व्यापक सहमति की रणनीति

सरकार केवल कांग्रेस तक सीमित नहीं है। इससे पहले ऐसी रिपोर्टें भी सामने आई थीं कि केंद्र ने DMK और तृणमूल कांग्रेस जैसे क्षेत्रीय दलों के साथ बातचीत के रास्ते खोले हैं। इससे संकेत मिलता है कि सरकार विवादित मुद्दे पर व्यापक राजनीतिक समर्थन तलाश रही है।

हालांकि राहुल गांधी का ताजा रुख बताता है कि कांग्रेस को साथ लाना आसान नहीं होगा। विपक्षी दल पहले भी महिला आरक्षण का समर्थन करते हुए प्रस्तावित परिसीमन व्यवस्था का विरोध कर चुके हैं।

क्यों महत्वपूर्ण है यह राजनीतिक टकराव?

परिसीमन का असर भविष्य के आम चुनावों से कहीं आगे जा सकता है। लोकसभा सीटों के वितरण में किसी बड़े बदलाव से राज्यों की राष्ट्रीय राजनीति में हिस्सेदारी भी बदल सकती है। इसी वजह से सरकार के लिए केवल विधायी संख्या जुटाना ही नहीं, बल्कि राज्यों की आशंकाओं को दूर करना भी महत्वपूर्ण होगा।

दूसरी ओर, विपक्ष के लिए यह संघीय प्रतिनिधित्व और राजनीतिक संतुलन का मुद्दा बन गया है। कांग्रेस यदि अपने मौजूदा रुख पर कायम रहती है तो संसद में परिसीमन पर सरकार और विपक्ष के बीच लंबी राजनीतिक तथा संवैधानिक बहस देखने को मिल सकती है।

संतुलित विश्लेषण

सरकार के दृष्टिकोण से आबादी में दशकों के दौरान आए बदलावों के बाद प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की समीक्षा का तर्क महत्वपूर्ण है। समान प्रतिनिधित्व लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल सिद्धांत है और इसी आधार पर परिसीमन की आवश्यकता को उचित ठहराया जा सकता है।

वहीं विपक्ष की चिंता भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। यदि नई व्यवस्था से कुछ राज्यों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ती और अन्य की सापेक्ष हिस्सेदारी घटती है, तो इसका असर भारत के संघीय शक्ति-संतुलन पर पड़ सकता है। इसलिए इस मुद्दे का टिकाऊ समाधान केवल संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक सहमति और पारदर्शी मानदंडों के जरिए निकलना अधिक महत्वपूर्ण होगा।

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