गुजरात हाई कोर्ट से केजरीवाल को राहत नहीं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक डिग्री से जुड़े वर्षों पुराने सूचना के अधिकार (RTI) विवाद में अरविंद केजरीवाल को गुजरात हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली है।
मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति डी.एन. रे की खंडपीठ ने केजरीवाल की अपील खारिज करते हुए मार्च 2023 के एकल न्यायाधीश के फैसले में हस्तक्षेप करने का आधार नहीं पाया। इसके साथ ही पहले लगाया गया ₹25,000 का खर्च भी बरकरार है। हालांकि खंडपीठ ने अपील खारिज करते समय कोई अतिरिक्त खर्च नहीं लगाया।
अदालत ने Kejriwal की प्रतिक्रिया पर क्या कहा?
फैसले में अदालत ने उस तरीके का भी उल्लेख किया, जिसमें केजरीवाल ने केंद्रीय सूचना आयोग की कार्यवाही के दौरान प्रतिक्रिया दी थी।
खंडपीठ ने कहा कि CIC की कार्यवाही में अपीलकर्ता ने जिस तरह प्रतिक्रिया दी और बाद में लिखित दलीलों के जरिए मामले को आगे बढ़ाया, वह अपने आप में स्थिति स्पष्ट करता है। अदालत ने इस पर आगे टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं समझी।
अदालत ने व्यापक रूप से यह भी कहा कि सार्वजनिक पद पर रहने वाला कोई राजनीतिक नेता वैधानिक कार्यवाही का इस्तेमाल राजनीतिक हितों के लिए नहीं कर सकता। यह टिप्पणी इस मामले में RTI प्रक्रिया के इस्तेमाल को लेकर अदालत के आकलन का हिस्सा थी।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
इस कानूनी विवाद की जड़ें 2016 तक जाती हैं।
उस समय केंद्रीय सूचना आयोग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक योग्यता से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराने के संबंध में निर्देश जारी किया था। विवाद की शुरुआत उस कार्यवाही से हुई जिसमें मूल मामला केजरीवाल के अपने Electoral Photo Identity Card से जुड़ी सूचना का था। इसी दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री की शैक्षणिक योग्यता की जानकारी को लेकर सवाल उठाया। CIC ने उनके पत्र को RTI आवेदन के रूप में लिया और विश्वविद्यालयों को संबंधित जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
गुजरात यूनिवर्सिटी ने CIC के निर्देश को गुजरात हाई कोर्ट में चुनौती दी।
2023 में हाई कोर्ट ने पलट दिया था CIC का आदेश
31 मार्च 2023 को गुजरात हाई कोर्ट के एकल न्यायाधीश ने गुजरात यूनिवर्सिटी की याचिका स्वीकार करते हुए CIC का 2016 का निर्देश रद्द कर दिया था।
उस फैसले में केजरीवाल पर ₹25,000 का खर्च भी लगाया गया था। अदालत ने उस समय RTI प्रक्रिया और मामले को आगे बढ़ाए जाने के तरीके की आलोचना की थी।
यही ₹25,000 का खर्च और एकल पीठ के निष्कर्ष बाद की अपील में महत्वपूर्ण मुद्दा बने।
केजरीवाल की ओर से क्या दलील दी गई?
केजरीवाल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने मुख्य रूप से ₹25,000 के खर्च लगाए जाने के आधार पर सवाल उठाया।
उनकी दलील थी कि एकल न्यायाधीश ने यह माना था कि केजरीवाल लगातार इस मामले को आगे बढ़ाते रहे, जबकि अपीलकर्ता के अनुसार उन्होंने लगभग तीन साल तक कोई जवाब दाखिल नहीं किया था। इस आधार पर यह सवाल उठाया गया कि उन्हें मामले में लगातार बने रहने वाला पक्ष कैसे माना जा सकता है।
केजरीवाल पक्ष ने यह तर्क भी रखा कि CIC ने उनके पत्र के आधार पर स्वयं कार्यवाही शुरू की थी और इसे औपचारिक RTI आवेदन की तरह लिया था।
गुजरात यूनिवर्सिटी का क्या पक्ष था?
गुजरात यूनिवर्सिटी की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपील का विरोध किया।
यूनिवर्सिटी की ओर से तर्क दिया गया कि RTI व्यवस्था का उपयोग केवल जिज्ञासा पूरी करने के लिए नहीं किया जा सकता और ऐसी कार्यवाहियों में सार्वजनिक संस्थानों के समय तथा संसाधनों का इस्तेमाल होता है। विश्वविद्यालय ने पहले यह भी कहा था कि संबंधित डिग्री की जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध कराई गई थी।
अदालत ने अंततः एकल न्यायाधीश के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं पाया।
RTI और निजी जानकारी का सवाल
इस मामले का महत्व केवल प्रधानमंत्री की डिग्री से जुड़े राजनीतिक विवाद तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में एक व्यापक कानूनी सवाल भी रहा है—किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति की शैक्षणिक जानकारी RTI कानून के तहत कब सार्वजनिक की जा सकती है और इसके लिए बड़े सार्वजनिक हित का आधार किस तरह स्थापित किया जाना चाहिए।
ताज़ा फैसले में हाई कोर्ट ने माना कि CIC ने जिस तरीके से केजरीवाल के पत्र का स्वतः संज्ञान लेकर दूसरे अपील चरण में डिग्री की जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया, वह निर्धारित RTI प्रक्रिया के अनुरूप नहीं था। अदालत ने यह भी माना कि मामले में ऐसा बड़ा सार्वजनिक हित स्थापित नहीं किया गया था जो संबंधित शैक्षणिक रिकॉर्ड के प्रकटीकरण को आवश्यक बनाए।
मामला राजनीतिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है?
प्रधानमंत्री मोदी की शैक्षणिक योग्यता का मुद्दा कई वर्षों से राजनीतिक बहस का हिस्सा रहा है। केजरीवाल और AAP ने इस विषय पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए हैं, जबकि गुजरात यूनिवर्सिटी ने सूचना सार्वजनिक करने के लिए RTI प्रक्रिया के इस्तेमाल को अदालत में चुनौती दी थी।
हालिया फैसला इस राजनीतिक बहस की सत्यता या असत्यता तय करने के बजाय उस कानूनी प्रक्रिया और RTI के दायरे पर केंद्रित है जिसके जरिए जानकारी मांगी गई थी।
इस अंतर को समझना महत्वपूर्ण है: अदालत का निर्णय मुख्य रूप से CIC के अधिकार, RTI प्रक्रिया, व्यक्तिगत जानकारी और सार्वजनिक हित से जुड़े कानूनी प्रश्नों पर है।
आगे क्या?
29 सितंबर 2026 के फैसले के बाद एकल न्यायाधीश का 2023 का आदेश प्रभावी बना हुआ है। इसका अर्थ है कि गुजरात यूनिवर्सिटी को प्रधानमंत्री मोदी की डिग्री से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराने का CIC का 2016 का निर्देश रद्द ही रहेगा और केजरीवाल पर लगाया गया ₹25,000 का खर्च भी बरकरार रहेगा।
