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राजनीति

PMLA में ED की Property Attachment पर Supreme Court के सवाल—3,501 आदेश और सिर्फ 60 पूरे Trials का क्या मतलब?

Supreme Court ने PMLA के तहत ED की provisional property attachments की समीक्षा करने वाली Adjudicating Authority की संरचना और workload पर सवाल उठाए हैं। अदालत ने पूछा कि क्या single-member bench सीमित समय में बड़ी संख्या में मामलों की वास्तविक स्वतंत्र जांच कर सकती है।

PMLA में ED की Property Attachment पर Supreme Court के सवाल—3,501 आदेश और सिर्फ 60 पूरे Trials का क्या मतलब?
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द्वारा जीत निर्मल

स्रोत: JantaScope

भारत के मनी-लॉन्ड्रिंग कानून के तहत किसी व्यक्ति या कंपनी की संपत्ति को अटैच करने के बाद उस कार्रवाई की स्वतंत्र जांच कितनी प्रभावी है?

Supreme Court में मंगलवार, 15 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान यही सवाल केंद्र में आ गया।

Chief Justice of India Surya Kant, Justice Joymalya Bagchi और Justice V Mohana की तीन-सदस्यीय पीठ ने Prevention of Money Laundering Act (PMLA) के तहत Enforcement Directorate (ED) द्वारा किए गए provisional attachment की पुष्टि करने वाली Adjudicating Authority के कामकाज और संरचना पर कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए।

मुद्दा केवल यह नहीं था कि ED के पास संपत्ति अटैच करने की शक्ति कितनी व्यापक है।

अदालत की चिंता इससे आगे थी—जब किसी attachment के व्यक्ति के property rights पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं, तो उसकी समीक्षा करने वाली व्यवस्था वास्तव में कितनी स्वतंत्र और गहन है?

Supreme Court ने इन मुद्दों पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है और ED से अतिरिक्त आंकड़े भी मांगे हैं।

Supreme Court ने वास्तव में क्या पूछा?

सुनवाई का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा Adjudicating Authority के workload से जुड़ा था।

Justice Joymalya Bagchi ने इस बात पर सवाल उठाया कि यदि एक tribunal को सीमित statutory period के भीतर हजारों attachment matters पर विचार करना पड़े, तो क्या प्रत्येक मामले में वास्तविक application of mind संभव है।

अदालत ने सवाल किया:

“Will there be real application of mind or signing on the dotted lines?”

यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है क्योंकि PMLA के तहत property attachment केवल एक accounting entry नहीं है।

अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि attachment के व्यक्ति की possession और property में प्रवेश करने के अधिकार पर civil consequences हो सकते हैं।

यानी Supreme Court का वर्तमान सवाल यह नहीं है कि हर ED attachment गलत है।

सवाल यह है कि ऐसी कार्रवाई को confirm करने से पहले मिलने वाली statutory scrutiny पर्याप्त रूप से वास्तविक और स्वतंत्र है या नहीं।

PMLA में property attachment कैसे काम करता है?

इस विवाद को समझने के लिए PMLA की प्रक्रिया समझना जरूरी है।

कानून की Section 5 कुछ परिस्थितियों में ED के अधिकृत अधिकारी को ऐसी property को provisionally attach करने की अनुमति देती है जिसे वह “proceeds of crime” से संबंधित मानता है, बशर्ते कानून में निर्धारित शर्तें पूरी हों।

इसके बाद मामला PMLA की Adjudicating Authority के सामने जाता है।

Section 8 के तहत Authority संबंधित व्यक्ति को notice देकर उसका पक्ष सुनती है और उपलब्ध material पर विचार करती है।

यदि Authority इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि property money laundering से जुड़ी है, तो provisional attachment को confirm किया जा सकता है।

यही चरण मौजूदा Supreme Court proceedings का केंद्र है।

Petitioners का तर्क है कि इतनी गंभीर quasi-judicial प्रक्रिया को अकेले एक non-judicial member द्वारा संभालना पर्याप्त safeguard नहीं हो सकता।

विवाद: क्या single-member bench पर्याप्त है?

PMLA की Section 6 Adjudicating Authority की संरचना का प्रावधान करती है।

कानून Authority में एक Chairperson और दो अन्य members की व्यवस्था करता है, जिनके लिए law, administration, finance या accountancy जैसे क्षेत्रों में निर्धारित योग्यता का framework है।

साथ ही कानून benches के गठन की भी अनुमति देता है, जिनमें एक या दो सदस्य हो सकते हैं।

यहीं से कानूनी विवाद पैदा होता है।

Petitioners का कहना है कि property attachment जैसे गंभीर quasi-judicial फैसले में judicial member की मौजूदगी महत्वपूर्ण safeguard है।

ED की ओर से पेश पक्ष ने single-member mechanism का बचाव करते हुए Section 6 की bench-constitution provisions पर भरोसा किया और कहा कि हर attachment matter में जटिल कानूनी प्रश्न जरूरी नहीं होते।

Supreme Court को अब इन्हीं competing interpretations पर फैसला देना है।

ED के अपने आंकड़े इस बहस को क्यों महत्वपूर्ण बनाते हैं?

सुनवाई में सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाला हिस्सा ED के case statistics से जुड़ा था।

31 मार्च 2026 तक ED के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं:

8,851 ECIR दर्ज किए गए थे।

इनमें 3,501 Provisional Attachment Orders (PAOs) जारी किए गए।

इन PAOs में शामिल संपत्तियों की कुल घोषित राशि लगभग ₹2.36 लाख करोड़ थी।

Adjudicating Authority ने 2,593 PAOs confirm किए थे, जिनकी राशि करीब ₹1.29 लाख करोड़ थी।

इसी अवधि तक ED ने 2,396 prosecution complaints दाखिल की थीं।

लेकिन PMLA के तहत trial केवल 60 cases में पूरा हुआ था।

इन 60 completed trials में 56 conviction और चार acquittal में समाप्त हुए।

ये आंकड़े सीधे Enforcement Directorate की official statistics page पर उपलब्ध हैं।

“8,851 cases और 60 trials” का मतलब सावधानी से समझना जरूरी है

सुनवाई में Senior Advocate Gopal Sankaranarayanan ने petitioners की ओर से ED के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए 8,851 cases और 60 completed trials के बीच अंतर पर ध्यान दिलाया।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण distinction है।

8,851 ECIR और 60 completed trials को सीधे conviction rate की तरह compare करना सही नहीं होगा।

क्योंकि इन 8,851 मामलों में बड़ी संख्या अभी investigation, prosecution या trial के अलग-अलग चरणों में हो सकती है।

ED के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 31 मार्च 2026 तक 2,396 prosecution complaints दाखिल हुई थीं और 466 cases में charges frame हुए थे।

इसलिए 60 का आंकड़ा यह बताता है कि कितने PMLA trials उस तारीख तक पूरे हो चुके थे, न कि यह कि बाकी सभी cases विफल हो गए।

यह distinction इस बहस को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

फिर Supreme Court की चिंता क्या है?

Court के सामने बड़ा institutional question यह है कि criminal prosecution के अंतिम नतीजे से काफी पहले property attachment के गंभीर civil consequences शुरू हो सकते हैं।

Petitioners का argument है कि यदि final criminal adjudication में लंबा समय लगता है, तो interim attachment की स्वतंत्र और प्रभावी समीक्षा और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

यही कारण है कि bench ने ED से पूछा कि कितने attachment orders हुए हैं और उनके खिलाफ challenges को Adjudicating Authority ने कितने समय में dispose किया।

Court ने ED को इस संबंध में note दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया।

ED ने “3,000 cases” वाली तस्वीर पर आपत्ति क्यों की?

इस बिंदु पर सरकार/ED का पक्ष भी महत्वपूर्ण है।

ED की ओर से Additional Solicitor General Anil Kaushik ने petitioners द्वारा बताए गए आंकड़ों पर आपत्ति की।

उन्होंने कहा कि लगभग 3,000 attachment orders का अर्थ 3,000 अलग-अलग cases नहीं है क्योंकि एक ही मामले में एक से अधिक attachment orders हो सकते हैं।

उन्होंने Court को बताया कि 1 अप्रैल 2024 से 31 मार्च 2025 के बीच 461 attachment orders जारी हुए थे।

इसलिए “एक tribunal को छह महीने में 3,000 अलग-अलग cases तय करने पड़ते हैं” जैसी सीधी व्याख्या को सावधानी से देखना चाहिए।

इसके बावजूद Court ने broader question बरकरार रखा—मामलों की संख्या कम भी हो, तो property rights को प्रभावित करने वाले मामलों की scrutiny केवल एक सदस्य द्वारा क्यों होनी चाहिए?

यह मामला सिर्फ ED की powers का नहीं है

इस litigation को “Supreme Court बनाम ED” के रूप में पेश करना oversimplification होगा।

असल संवैधानिक और statutory सवाल checks and balances का है।

PMLA में ED investigation करता है और provisional attachment order जारी कर सकता है।

उस attachment पर Adjudicating Authority एक अलग statutory scrutiny प्रदान करती है।

इसके बाद appellate और judicial remedies भी उपलब्ध हो सकती हैं।

इसलिए मौजूदा dispute का महत्व इस बात में है कि इस chain में Adjudicating Authority कितना मजबूत और स्वतंत्र institutional checkpoint होना चाहिए।

Vijay Madanlal judgment का इस विवाद से क्या संबंध है?

2022 के Vijay Madanlal Choudhary v. Union of India judgment में Supreme Court ने PMLA के कई महत्वपूर्ण provisions की constitutional validity बरकरार रखी थी।

उस judgment ने ED की inquiry, arrest, attachment और prosecution framework से जुड़े कई challenges पर महत्वपूर्ण निष्कर्ष दिए।

मौजूदा petitioners का argument है कि उस समय Court ने PMLA framework में मौजूद procedural safeguards को महत्व दिया था।

उनका कहना है कि यदि Adjudicating Authority itself पर्याप्त judicial scrutiny उपलब्ध नहीं कराती, तो attachment framework में एक महत्वपूर्ण safeguard कमजोर हो सकता है।

ED/Union का पक्ष अलग है: कानून स्वयं single- या two-member benches की अनुमति देता है और statutory provisions को उसी framework में पढ़ा जाना चाहिए।

Supreme Court ने अभी इन competing arguments में से किसी को अंतिम रूप से स्वीकार नहीं किया है।

JantaScope Analysis: फैसला PMLA की शक्ति से ज्यादा उसकी निगरानी को परिभाषित कर सकता है

इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि Supreme Court फिलहाल ED से उसकी मूल attachment power छीनने पर फैसला नहीं कर रहा।

वास्तविक institutional question अधिक सूक्ष्म है:

जब राज्य किसी व्यक्ति की property को criminal trial पूरा होने से पहले attach करता है, तो उस कार्रवाई पर independent scrutiny का न्यूनतम स्तर क्या होना चाहिए?

यदि Court judicial member की मौजूदगी या multi-member scrutiny को जरूरी मानता है, तो इसका असर PMLA Adjudicating Authority की future functioning पर पड़ सकता है।

इसके विपरीत, यदि Court मौजूदा single-member arrangement को statute के अनुरूप मानता है, तो वर्तमान framework को महत्वपूर्ण judicial backing मिल सकती है।

लेकिन judgment आने से पहले दोनों में से किसी परिणाम को निश्चित मानना गलत होगा।

₹2.36 लाख करोड़ का आंकड़ा भी पूरा संदर्भ मांगता है

ED के अनुसार 31 मार्च 2026 तक जारी 3,501 PAOs में शामिल assets का कुल value लगभग ₹2,36,016.61 करोड़ था।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि इतनी पूरी राशि final confiscation के रूप में सरकार के पास चली गई।

इसी official dataset में Adjudicating Authority द्वारा confirmed PAOs की value लगभग ₹1,28,858.35 करोड़ बताई गई है।

और PMLA Section 8(5) के तहत confiscation की दर्ज राशि ₹68.20 करोड़ थी।

Attachment, confirmation और final confiscation इसलिए तीन अलग-अलग stages हैं।

किसी headline में इन आंकड़ों को एक ही चीज के रूप में पेश करना PMLA प्रक्रिया की गलत तस्वीर दे सकता है।

Conviction rate के आंकड़े में भी यही सावधानी जरूरी है

ED अपने official statistics में completed PMLA trials के आधार पर 93.33% conviction rate बताता है।

यह गणना 60 completed trials में 56 convictions पर आधारित है।

लेकिन इसे सभी 8,851 ECIR पर लागू conviction rate समझना गलत होगा।

यह केवल उन मामलों का परिणाम बताता है जिनका trial 31 मार्च 2026 तक पूरा हो चुका था।

दिलचस्प रूप से ED की अपनी 2025-26 Annual Report भी स्वीकार करती है कि कुल registered cases की तुलना में केवल एक छोटा हिस्सा final verdict तक पहुंचा है। Agency इसके लिए money-laundering investigations की complexity और predicate offences की progress पर निर्भरता जैसे कारण बताती है।

इसलिए एक ही dataset दो अलग बातें दिखाता है:

Completed trials में conviction proportion बहुत ऊंचा है, लेकिन completed trials की संख्या कुल registered cases की तुलना में अभी बहुत कम है।

दोनों तथ्य एक साथ सही हो सकते हैं।

आगे क्या होगा?

Supreme Court ने arguments सुनने के बाद judgment reserve कर लिया है।

ED को attachment orders की संख्या और Adjudicating Authority द्वारा उनके disposal में लगने वाले समय से संबंधित additional data देने को कहा गया है।

अब आने वाला judgment मुख्य रूप से यह स्पष्ट कर सकता है कि:

क्या PMLA Adjudicating Authority की single-member bench property attachments confirm कर सकती है;

क्या ऐसे मामलों में judicial member आवश्यक है;

और PMLA की statutory structure को property rights तथा independent adjudication की जरूरत के साथ कैसे पढ़ा जाना चाहिए।

यह फैसला ED की investigation powers से कहीं आगे जाकर भारत के anti-money-laundering framework में institutional oversight की संरचना को प्रभावित कर सकता है।

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