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राजनीति

रायबरेली से अखिलेश यादव की PDA यात्रा: 2027 चुनाव से पहले क्यों सुर्खियों में आए सपा-कांग्रेस के रिश्ते?

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव 24 सितंबर 2026 को रायबरेली से अपनी PDA रथयात्रा का पहला चरण शुरू करने वाले हैं। राहुल गांधी के लोकसभा क्षेत्र से यात्रा की शुरुआत ऐसे समय हो रही है जब 2027 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए सपा और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे की बातचीत की तैयारी चल रही है। रायबरेली में कांग्रेस की राजनीतिक अहमियत और सपा के तीन मौजूदा विधायकों की मौजूदगी के कारण यह क्षेत्र दोनों दलों के समीकरण में खास बन गया है।

रायबरेली से अखिलेश यादव की PDA यात्रा: 2027 चुनाव से पहले क्यों सुर्खियों में आए सपा-कांग्रेस के रिश्ते?
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द्वारा जीत निर्मल

स्रोत: The Indian Express

रायबरेली से अखिलेश यादव की PDA यात्रा: 2027 चुनाव से पहले क्यों सुर्खियों में आए सपा-कांग्रेस के रिश्ते?

लखनऊ, 23 सितंबर 2026: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष Akhilesh Yadav 24 सितंबर को रायबरेली से अपनी प्रस्तावित PDA रथयात्रा का पहला चरण शुरू करने जा रहे हैं। खास बात यह है कि रायबरेली कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi का संसदीय क्षेत्र है।

यात्रा की जगह और समय ने इसलिए भी राजनीतिक ध्यान खींचा है क्योंकि सपा और कांग्रेस 2027 के विधानसभा चुनाव में गठबंधन जारी रखने की स्थिति में सीट बंटवारे पर बातचीत की तैयारी कर रहे हैं। कांग्रेस की ओर से इन वार्ताओं को जल्द शुरू करने की मांग भी सामने आई है।

क्या है अखिलेश यादव की PDA रणनीति?

सपा की राजनीति में PDA का अर्थ 'पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक' है। पार्टी इस सामाजिक गठजोड़ को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले और मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

प्रस्तावित प्रदेशव्यापी रथयात्रा के लिए विशेष बस तैयार की गई है। पहले चरण में अखिलेश यादव का रथ बछरावां से शुरू होकर हरचंदपुर के सपा विधायक राहुल लोधी के आवास तक जाएगा और उसके बाद रायबरेली शहर में यात्रा का समापन होगा। पूरी प्रदेशव्यापी यात्रा का अंतिम कार्यक्रम और रूट अभी तय नहीं हुआ है।

फिरोज गांधी डिग्री कॉलेज विवाद भी तत्काल वजह

सपा ने रायबरेली कार्यक्रम के पीछे एक तत्काल स्थानीय कारण भी बताया है।

17 सितंबर को रायबरेली के फिरोज गांधी डिग्री कॉलेज में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) और सपा से जुड़े छात्र सभा के सदस्यों के बीच झड़प हुई थी। सपा ने आरोप लगाया कि उसके छात्र नेताओं के साथ मारपीट हुई और प्रशासन की प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं थी। हरचंदपुर विधायक राहुल लोधी ने भी पुलिस पर कथित "high-handedness" और "caste discrimination" का आरोप लगाया। ये आरोप संबंधित पक्षों के दावे हैं, स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य नहीं।

सपा प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी के मुताबिक, इसी घटनाक्रम के बाद अखिलेश यादव ने राहुल लोधी के घर चाय पीने और रायबरेली में रथयात्रा निकालने का फैसला किया। उन्होंने यह भी कहा कि 24 सितंबर के कार्यक्रम को अलग संदर्भ में देखा जाना चाहिए और PDA यात्रा का औपचारिक शुभारंभ बाद में होगा।

रायबरेली ही क्यों बना सपा-कांग्रेस समीकरण का केंद्र?

रायबरेली कांग्रेस के लिए लंबे समय से महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है और वर्तमान में राहुल गांधी यहां से लोकसभा सांसद हैं। दूसरी ओर, विधानसभा स्तर पर सपा की मौजूदगी मजबूत है।

रायबरेली लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली पांच विधानसभा सीटों में तीन—बछरावां, हरचंदपुर और सरेनी—सपा विधायकों के पास हैं। रायबरेली और ऊंचाहार सीट भाजपा के पास हैं।

यही आंकड़ा आगामी सीट बंटवारे की बातचीत में महत्वपूर्ण हो सकता है। सपा अपने मौजूदा विधायकों और विधानसभा स्तर की मौजूदगी के आधार पर जिले की अधिक सीटों पर दावा कर सकती है, जबकि कांग्रेस के लिए यह राहुल गांधी का संसदीय क्षेत्र होने के कारण विशेष राजनीतिक महत्व रखता है।

सीट बंटवारे में दोनों दलों के दावे

जून 2026 में सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक, सपा और कांग्रेस दोनों ने संभावित सीट बंटवारे के लिए आंतरिक स्तर पर तैयारियां शुरू कर दी थीं। सपा सूत्रों के हवाले से तब बताया गया था कि पार्टी कांग्रेस के लिए 60-80 सीटों की संभावनाओं पर विचार कर रही थी, जबकि कांग्रेस के भीतर शुरुआती बातचीत में करीब 120 सीटों की मांग और अंततः लगभग 80 सीटों पर समझौते की संभावना की चर्चा थी। ये औपचारिक सीट-बंटवारा समझौता नहीं, बल्कि उस समय सूत्रों द्वारा बताई गई बातचीत की संभावित स्थिति थी।

उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं और चुनाव फरवरी 2027 में होने हैं।

2024 में साथ आने से बदला था समीकरण

सपा और कांग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में गठबंधन किया था। उस चुनाव में सपा ने कांग्रेस को 17 लोकसभा सीटें दी थीं। दोनों दलों के गठबंधन ने उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 43 सीटें जीती थीं।

लेकिन विधानसभा चुनाव में सीटों का बंटवारा अलग चुनौती है। 403 सीटों वाले चुनाव में दोनों पार्टियों के स्थानीय नेताओं, संभावित उम्मीदवारों और सामाजिक आधार के दावे कई क्षेत्रों में एक-दूसरे से टकरा सकते हैं।

इसकी झलक पहले भी दिखाई दे चुकी है। 2024 के बाद हुए विधानसभा उपचुनावों में कांग्रेस ने कुछ प्रस्तावित सीटों को अपने लिए अनुकूल नहीं माना और चुनाव मैदान में नहीं उतरी। कांग्रेस नेताओं के बीच यह तर्क भी रहा है कि भविष्य के समझौते में केवल सीटों की संख्या नहीं, बल्कि उनके जीतने की संभावना और सामाजिक समीकरण भी महत्वपूर्ण होंगे।

कांग्रेस की रायबरेली पर नजर

रायबरेली में यही सवाल और जटिल हो जाता है। कांग्रेस का यहां कोई मौजूदा विधायक नहीं है, लेकिन लोकसभा सीट राहुल गांधी के पास है। इसके विपरीत सपा के पास संबंधित पांच विधानसभा क्षेत्रों में से तीन विधायक हैं।

The Indian Express से बात करते हुए एक प्रदेश कांग्रेस नेता ने कहा कि रायबरेली पार्टी के लिए सामान्य जिला नहीं बल्कि राहुल गांधी का निर्वाचन क्षेत्र है। नेता ने स्वीकार किया कि सपा के तीन मौजूदा विधायक हैं और कांग्रेस का कोई विधायक नहीं, लेकिन साथ ही कहा कि कांग्रेस यहां सीटों में "सम्मानजनक हिस्सेदारी" की अपेक्षा करेगी।

इसलिए रायबरेली में दोनों दलों के पास अलग-अलग आधार पर राजनीतिक दावे मौजूद हैं—कांग्रेस के पास लोकसभा प्रतिनिधित्व है, जबकि सपा के पास विधानसभा स्तर पर मौजूदा प्रतिनिधित्व।

क्या PDA यात्रा कांग्रेस को कोई संदेश है?

सपा ने आधिकारिक तौर पर 24 सितंबर के कार्यक्रम को सीट बंटवारे से जोड़ने से इनकार किया है। इसलिए इसे कांग्रेस पर दबाव बनाने की पुष्टि की गई रणनीति के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।

हालांकि, यात्रा का स्थान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। यह सपा को राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र में अपने तीन मौजूदा विधायकों और PDA रणनीति को प्रमुखता से सामने रखने का अवसर देता है—वह भी ऐसे समय में जब दोनों दलों को विधानसभा चुनाव के लिए अपने-अपने सीट दावों पर बातचीत करनी है।

2027 से पहले असली परीक्षा सीट बंटवारा

सपा और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने 2024 के लोकसभा चुनाव में साथ काम किया, लेकिन विधानसभा चुनाव का पैमाना काफी बड़ा है। स्थानीय उम्मीदवारों की आकांक्षाएं, मौजूदा विधायक, सामाजिक समीकरण और दोनों पार्टियों का संगठनात्मक आधार सीट-बंटवारे की बातचीत को प्रभावित कर सकते हैं। जून की रिपोर्ट में भी दोनों दलों के भीतर संभावित उम्मीदवारों के कारण बातचीत चुनौतीपूर्ण होने की आशंका बताई गई थी।

ऐसे में अखिलेश यादव की रायबरेली यात्रा का तत्काल घोषित संदर्भ स्थानीय छात्र विवाद और PDA राजनीति है, जबकि इसका व्यापक राजनीतिक महत्व सपा-कांग्रेस के आगामी सीट-बंटवारे और 2027 की चुनावी रणनीतियों से जुड़ता है।

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