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राजनीति

संसद Day 10: ‘तानाशाही’ के आरोप के बीच खत्म हुआ दिन, लोकसभा में बिना बहस पास हुआ जन्म-मृत्यु संशोधन विधेयक

संसद के मानसून सत्र का दसवां दिन सरकार और विपक्ष के बीच जारी टकराव, विरोध और हंगामे के बीच समाप्त हुआ। लोकसभा में विपक्षी प्रदर्शन के दौरान Registration of Births and Deaths (Amendment) Bill, 2026 को बिना विस्तृत बहस के पारित कर दिया गया। इस बीच ‘तानाशाही’ जैसे आरोपों ने सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक तनाव को और गहरा कर दिया।

संसद Day 10: ‘तानाशाही’ के आरोप के बीच खत्म हुआ दिन, लोकसभा में बिना बहस पास हुआ जन्म-मृत्यु संशोधन विधेयक
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द्वारा जीत निर्मल

स्रोत: जनता स्कोप

संसद के Day 10 पर भी जारी रहा राजनीतिक टकराव

संसद के मानसून सत्र का दसवां दिन भी हंगामे, विरोध और सरकार-विपक्ष के बीच तीखी राजनीतिक खींचतान के नाम रहा।

लोकसभा में विपक्षी सांसदों के विरोध के बीच Registration of Births and Deaths (Amendment) Bill, 2026 को पारित कर दिया गया। हालांकि, सदन में जारी व्यवधान के कारण विधेयक पर विस्तृत चर्चा नहीं हो सकी।

इस घटनाक्रम ने एक बार फिर संसद में विधायी कामकाज और सार्थक बहस के बीच संतुलन को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

बिना बहस पास हुआ जन्म-मृत्यु संशोधन विधेयक

लोकसभा ने हंगामे के बीच Registration of Births and Deaths (Amendment) Bill, 2026 को मंजूरी दे दी।

सामान्य परिस्थितियों में किसी विधेयक पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के सांसद अपनी राय रखते हैं, प्रावधानों पर सवाल उठाते हैं और संभावित बदलावों को लेकर सुझाव देते हैं।

लेकिन लगातार विरोध और व्यवधान के कारण इस विधेयक पर ऐसी विस्तृत चर्चा नहीं हो सकी।

यही पहलू इस विधेयक के पारित होने को राजनीतिक और संसदीय दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाता है।

विपक्ष क्यों कर रहा था विरोध?

मौजूदा संसदीय गतिरोध के पीछे छात्रों से जुड़े प्रदर्शन, कथित पुलिस कार्रवाई और शिक्षा तथा परीक्षा से जुड़े मुद्दे प्रमुख कारणों में रहे हैं।

विपक्षी दलों ने कथित परीक्षा अनियमितताओं और प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई को लेकर सरकार से जवाबदेही की मांग की है।

सत्र के दौरान विपक्षी नेताओं ने संसद परिसर और उसके बाहर भी विरोध प्रदर्शन किए।

इन मुद्दों पर जारी टकराव का असर प्रश्नकाल और दूसरे निर्धारित संसदीय कामकाज पर भी पड़ा है।

‘तानाशाही’ वाले बयान से बढ़ी सियासी गर्मी

मौजूदा राजनीतिक टकराव के दौरान विपक्ष की ओर से सरकार पर ‘तानाशाही’ के आरोप भी लगाए गए हैं।

इससे पहले कांग्रेस नेता सिद्धारमैया ने छात्रों के समर्थन में हुए विरोध के दौरान राहुल गांधी को हिरासत में लिए जाने की आलोचना करते हुए इसे ‘तानाशाही’ से जोड़ा था।

विपक्ष का व्यापक आरोप है कि असहमति और विरोध के लिए पर्याप्त लोकतांत्रिक जगह नहीं छोड़ी जा रही।

हालांकि, ‘तानाशाही’ एक राजनीतिक आरोप है और इसे संसदीय व्यवस्था की स्थापित तथ्यात्मक व्याख्या के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

सरकार ने विपक्षी हंगामे को ठहराया जिम्मेदार

दूसरी ओर, सरकार और सत्तारूढ़ दल का कहना है कि विपक्ष के लगातार विरोध और हंगामे के कारण संसद में सामान्य कामकाज प्रभावित हो रहा है।

सरकार का तर्क है कि वह महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के लिए तैयार है, लेकिन नारेबाजी और बार-बार होने वाले व्यवधान के कारण सदन में सार्थक बहस नहीं हो पा रही।

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू भी पहले विपक्ष पर सदन की कार्यवाही बाधित करने का आरोप लगा चुके हैं।

यहीं मौजूदा गतिरोध का सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है।

विपक्ष का आरोप है कि सरकार जवाबदेही से बच रही है, जबकि सरकार का कहना है कि विपक्ष खुद चर्चा नहीं होने दे रहा।

बिना चर्चा विधेयक पारित होना क्यों महत्वपूर्ण?

यह विवाद केवल जन्म-मृत्यु संशोधन विधेयक तक सीमित नहीं है।

संसद सिर्फ मतदान करके कानून पारित करने की जगह नहीं है। यह प्रस्तावित कानूनों की सार्वजनिक जांच और चर्चा का भी प्रमुख लोकतांत्रिक मंच है।

संसदीय बहस के दौरान सांसद किसी विधेयक के प्रावधानों पर सवाल उठा सकते हैं, अपने निर्वाचन क्षेत्रों से जुड़े मुद्दे सामने रख सकते हैं और संभावित कमियों की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं।

इसलिए जब कोई विधेयक बिना विस्तृत बहस के पारित होता है तो उसके विधायी परीक्षण की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठ सकते हैं।

संसदीय हंगामे की भी होती है लोकतांत्रिक कीमत

हालांकि, बहस नहीं होने की जिम्मेदारी का आकलन केवल एक पक्ष के आधार पर करना भी उचित नहीं होगा।

लगातार व्यवधान होने से सांसदों के लिए मंत्रियों से सवाल पूछना, विधेयकों पर चर्चा करना और दूसरे महत्वपूर्ण मुद्दे उठाना मुश्किल हो जाता है।

यदि विरोध के कारण सदन लगातार स्थगित होता रहे तो संसदीय निगरानी की प्रक्रिया भी कमजोर हो सकती है।

ऐसे में दो सवाल सामने आते हैं—क्या पर्याप्त चर्चा के बिना सरकार को विधेयक आगे बढ़ाना चाहिए और क्या विपक्ष की विरोध रणनीति में विधायी चर्चा के लिए भी जगह होनी चाहिए?

मानसून सत्र में लगातार देखने को मिला गतिरोध

मानसून सत्र के शुरुआती दिनों से ही सरकार और विपक्ष के बीच कई मुद्दों को लेकर टकराव देखने को मिला है।

परीक्षाओं से जुड़े विवाद, छात्र प्रदर्शन, कथित पुलिस कार्रवाई और राजनीतिक जवाबदेही की मांग ने कई बार सदन की कार्यवाही प्रभावित की।

कुछ मामलों में सरकार और विपक्ष के बीच सहमति बनने के बाद चर्चा भी संभव हुई।

यह दिखाता है कि जब दोनों पक्ष संसदीय रणनीति पर सहमति बनाते हैं तो विरोध के बावजूद विधायी बहस के लिए रास्ता निकाला जा सकता है।

संसद के लिए क्या मायने रखता है Day 10?

Day 10 का घटनाक्रम भारतीय संसदीय राजनीति की एक महत्वपूर्ण चुनौती को सामने लाता है—विधायी उत्पादकता और विधायी चर्चा हमेशा एक ही बात नहीं होती।

संसद हंगामे के बीच भी विधेयक पारित करके तकनीकी रूप से अपना काम आगे बढ़ा सकती है, लेकिन कानून बनाने की गुणवत्ता इस बात पर भी निर्भर करती है कि प्रस्तावों की कितनी गंभीरता से जांच और चर्चा हुई।

विपक्ष के पास विरोध दर्ज कराने का लोकतांत्रिक अधिकार है, जबकि सरकार के पास अपना विधायी एजेंडा आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है।

चुनौती यह तय करने की है कि विरोध किस बिंदु पर संसदीय कामकाज को पूरी तरह रोक देता है और सरकार को किस हद तक बिना चर्चा कानून पारित करने से बचना चाहिए।

संतुलित विश्लेषण

सरकार के लिए इस्तेमाल किया गया ‘तानाशाही’ शब्द विपक्ष की राजनीतिक आलोचना को दर्शाता है। इसलिए इसे एक आरोप के रूप में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए, किसी निष्पक्ष तथ्यात्मक निष्कर्ष के रूप में नहीं।

दूसरी तरफ, किसी विधेयक का बिना विस्तृत बहस के पारित होना संसदीय जांच और कानून बनाने की प्रक्रिया को लेकर वास्तविक सवाल जरूर पैदा करता है।

सरकार का यह तर्क हो सकता है कि लगातार हंगामे के कारण चर्चा संभव नहीं हो पा रही है। वहीं विपक्ष यह सवाल उठा सकता है कि जब सदन में विधेयक की पर्याप्त जांच नहीं हो पा रही तो उसे तत्काल पारित करने की आवश्यकता क्यों है।

लोकतांत्रिक संसद के प्रभावी संचालन के लिए दोनों पहलू महत्वपूर्ण हैं।

सरकार को जवाबदेही और बहस के लिए पर्याप्त अवसर देना होता है, जबकि विपक्ष को भी विरोध के साथ संसदीय कामकाज के लिए जगह बनानी होती है।

इस लिहाज से Day 10 का घटनाक्रम सिर्फ एक विधेयक के पारित होने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस बड़ी बहस का हिस्सा है कि राजनीतिक टकराव के बीच संसद को उत्पादक होने के साथ-साथ विचार-विमर्श का प्रभावी मंच कैसे बनाए रखा जाए।


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