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राजनीति

शिवसेना का नाम और ‘धनुष-बाण’ किसका? सुप्रीम कोर्ट में फिर आमने-सामने शिंदे और ठाकरे गुट

शिवसेना के नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिन्ह को लेकर कानूनी लड़ाई फिर सुप्रीम कोर्ट के केंद्र में है। शिंदे गुट ने चुनाव आयोग के 2023 के फैसले का बचाव किया है, जबकि उद्धव ठाकरे गुट उसे चुनौती दे रहा है। जानिए अदालत के सामने असली कानूनी सवाल क्या हैं और फैसला क्यों दूरगामी महत्व रख सकता है।

शिवसेना का नाम और ‘धनुष-बाण’ किसका? सुप्रीम कोर्ट में फिर आमने-सामने शिंदे और ठाकरे गुट
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द्वारा जीत निर्मल

स्रोत: JantaScope

सुप्रीम कोर्ट में फिर केंद्र में शिवसेना की पहचान का सवाल

महाराष्ट्र की राजनीति को 2022 में बदल देने वाली शिवसेना की टूट अब एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के सामने महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गई है।

मंगलवार, 15 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना से जुड़े मामलों में अंतिम सुनवाई आगे बढ़ाई। इनमें उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले शिवसेना (UBT) की वह चुनौती भी शामिल है, जिसमें Election Commission of India के फरवरी 2023 के फैसले पर सवाल उठाया गया है। उस फैसले के तहत एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को “Shiv Sena” नाम और आरक्षित “Bow and Arrow” यानी धनुष-बाण चुनाव चिन्ह मिला था।

मौजूदा सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विवाद केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि कौन-सा गुट चुनाव चिन्ह इस्तेमाल करेगा। अदालत के सामने इससे बड़ा प्रश्न यह है कि किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल में विभाजन होने पर “असल राजनीतिक दल” की पहचान किन प्रमाणों के आधार पर की जानी चाहिए।

यही प्रश्न इस मामले को शिवसेना से आगे भारत में राजनीतिक दलों के भीतर भविष्य में होने वाले विवादों के लिए भी महत्वपूर्ण बनाता है।

15 सितंबर की सुनवाई में शिंदे गुट ने क्या कहा?

एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने Election Commission के फैसले का बचाव किया।

मौजूदा सुनवाई की रिपोर्ट के अनुसार, कौल ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष तर्क दिया कि शिवसेना का विवाद केवल विधायकों के एक समूह के अलग होने का मामला नहीं था, बल्कि राजनीतिक दल के भीतर विभाजन का मामला था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि Election Commission को पार्टी के संविधान, संगठनात्मक ढांचे और दूसरे उपलब्ध साक्ष्यों की जांच करके यह निर्धारित करने का अधिकार था कि कौन-सा गुट वास्तविक पार्टी का प्रतिनिधित्व करता है।

यह शिंदे पक्ष का कानूनी तर्क है, सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निष्कर्ष नहीं।

इसी अंतर को समझना इस मामले की रिपोर्टिंग में महत्वपूर्ण है।

विवाद की जड़: 2022 में शिवसेना में क्या हुआ था?

2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना के बड़ी संख्या में विधायक तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के नेतृत्व के खिलाफ चले गए थे।

इसके बाद महाराष्ट्र में राजनीतिक संकट पैदा हुआ और उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। बाद में एकनाथ शिंदे ने भाजपा के समर्थन से सरकार बनाई।

इसी राजनीतिक विभाजन के साथ यह प्रश्न भी सामने आया कि मूल शिवसेना का प्रतिनिधित्व कौन करता है।

दोनों पक्षों ने पार्टी की पहचान पर दावा किया और मामला Election Commission तक पहुंचा।

चुनाव आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड बताते हैं कि अक्टूबर 2022 में विवाद लंबित रहने के दौरान आयोग ने दोनों गुटों को अस्थायी रूप से मूल “Shiv Sena” नाम और “Bow and Arrow” चिन्ह इस्तेमाल करने से रोक दिया था।

बाद में आयोग ने फरवरी 2023 में शिंदे गुट के पक्ष में निर्णय दिया।

उद्धव ठाकरे पक्ष ने उसी निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

आज चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में स्थिति क्या है?

Election Commission के उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड में महाराष्ट्र के राज्य दलों की सूची में:

Shiv Sena — Bow and Arrow

और

Shiv Sena (Uddhav Balasaheb Thackeray) — Flaming Torch

दर्ज हैं।

महत्वपूर्ण बात यह है कि Election Commission के रिकॉर्ड में शिवसेना (UBT) के नाम और Flaming Torch चिन्ह के साथ यह भी दर्ज है कि मामला सुप्रीम कोर्ट के अंतिम आदेश के अधीन है।

इसलिए वर्तमान व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट में लंबित कानूनी चुनौती से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

असली कानूनी सवाल: विधायक संख्या या राजनीतिक संगठन?

यह इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।

सामान्य राजनीतिक बहस में सवाल अक्सर बहुत सरल रूप में रखा जाता है—किसके पास ज्यादा विधायक थे?

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सामने मामला इससे अधिक जटिल है।

Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 का Paragraph 15 Election Commission को मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के प्रतिद्वंद्वी समूहों के बीच विवाद का निर्णय करने की व्यवस्था देता है।

अब विवाद इस बात पर है कि ऐसी स्थिति में आयोग किन तत्वों को कितना महत्व दे सकता है—विधायी समर्थन, पार्टी संगठन, पार्टी संविधान और अन्य उपलब्ध साक्ष्य।

शिंदे पक्ष मौजूदा सुनवाई में आयोग द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोण का बचाव कर रहा है। ठाकरे पक्ष का मामला आयोग के उस निर्णय को चुनौती देता है।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय ही तय करेगा कि इस मामले में आयोग की प्रक्रिया और निष्कर्ष कानूनी कसौटी पर कायम रहते हैं या नहीं।

2023 का सुप्रीम कोर्ट फैसला यहां क्यों महत्वपूर्ण है?

इस विवाद को समझने के लिए 11 मई 2023 का Subhash Desai बनाम Principal Secretary, Governor of Maharashtra फैसला बेहद महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि देता है।

Supreme Court के आधिकारिक रिकॉर्ड से पुष्टि होती है कि संविधान पीठ ने 11 मई 2023 को महाराष्ट्र के 2022 राजनीतिक संकट से जुड़े मामलों में फैसला सुनाया था।

उस फैसले में अदालत ने एक महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया था: legislature party यानी विधायी दल और political party यानी राजनीतिक दल एक ही अवधारणा नहीं हैं।

अदालत ने यह भी कहा था कि Election Commission द्वारा किसी एक गुट को राजनीतिक दल के रूप में मान्यता देने का प्रभाव भविष्य से लागू होता है; वह पहले से शुरू हुई अयोग्यता की कार्यवाही को अपने-आप समाप्त नहीं करता।

यही वजह है कि वर्तमान मुकदमे को केवल “धनुष-बाण किसका?” जैसे सवाल में सीमित करना अधूरा होगा।

एक ही राजनीतिक टूट से निकले, लेकिन कानूनी सवाल अलग-अलग

शिवसेना विवाद में कई कानूनी धाराएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई दिखाई देती हैं, लेकिन वे पूरी तरह एक जैसी नहीं हैं।

एक तरफ सवाल है कि कौन-सा गुट वास्तविक राजनीतिक दल है और उसका आरक्षित चुनाव चिन्ह किसे मिलना चाहिए।

दूसरी तरफ सवाल विधायकों की अयोग्यता और Tenth Schedule से संबंधित है।

2023 के फैसले की अहमियत यही है कि सुप्रीम कोर्ट ने इन संवैधानिक प्रक्रियाओं को एक-दूसरे में मिला देने के बजाय उनके अलग कानूनी प्रभावों को पहचाना था।

मौजूदा कार्यवाही में पार्टी की पहचान और चुनाव आयोग के निर्णय के साथ-साथ महाराष्ट्र विधानसभा के तत्कालीन Speaker द्वारा शिंदे-समर्थक विधायकों को अयोग्य नहीं ठहराने से जुड़ी चुनौतियां भी सुप्रीम कोर्ट के सामने हैं।

2024 के चुनाव बताते हैं कि प्रतीक का सवाल केवल कानूनी नहीं है

इस विवाद का एक व्यावहारिक चुनावी पहलू भी है।

Election Commission के 2024 लोकसभा चुनाव रिकॉर्ड में शिंदे के नेतृत्व वाली पार्टी के उम्मीदवारों को Shiv Sena और Bow and Arrow, जबकि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले उम्मीदवारों को Shiv Sena (Uddhav Balasaheb Thackeray) और Flaming Torch के तहत चुनाव लड़ते हुए दर्ज किया गया है।

इससे पता चलता है कि फरवरी 2023 के आयोग के निर्णय ने केवल कानूनी नामकरण नहीं बदला।

उसके बाद दोनों राजनीतिक संगठनों ने अलग-अलग नाम और प्रतीकों के साथ मतदाताओं के सामने अपनी पहचान स्थापित की है।

इसी कारण सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय का महत्व ऐतिहासिक पार्टी पहचान के साथ-साथ चुनावी branding और संगठनात्मक निरंतरता के सवाल से भी जुड़ा है।

विश्लेषण: इस मामले का प्रभाव शिवसेना से आगे क्यों जा सकता है?

यह हिस्सा विश्लेषण है, अदालत का निष्कर्ष नहीं।

भारत में किसी राजनीतिक दल के टूटने पर तीन अलग-अलग प्रकार के “बहुमत” सामने आ सकते हैं:

विधायी बहुमत — कितने विधायक या सांसद किस पक्ष में हैं।

संगठनात्मक समर्थन — पार्टी संगठन के पदाधिकारी और इकाइयां किस पक्ष का समर्थन करती हैं।

पार्टी संविधान और संरचना — पार्टी के अपने नियमों के तहत निर्णय लेने और नेतृत्व चुनने का अधिकार किसके पास है।

समस्या तब पैदा होती है जब ये तीनों एक ही दिशा में न हों।

इसलिए सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय महत्वपूर्ण हो सकता है यदि वह यह और स्पष्ट करता है कि Paragraph 15 के विवाद में Election Commission को इन अलग-अलग प्रकार के साक्ष्यों को किस तरह देखना चाहिए।

ऐसा कोई निष्कर्ष आने से भविष्य के दूसरे पार्टी-विभाजन मामलों में कानूनी मार्गदर्शन मिल सकता है।

लेकिन जब तक फैसला नहीं आता, यह कहना उचित नहीं होगा कि अदालत कौन-सा परीक्षण स्वीकार या अस्वीकार करेगी।

आगे क्या देखना चाहिए?

आने वाली सुनवाई में केवल राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि अदालत द्वारा पूछे जाने वाले कानूनी प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण होंगे।

विशेष रूप से यह देखना उपयोगी होगा कि अदालत:

  • पार्टी संविधान की वैधता और उसके Election Commission के रिकॉर्ड से संबंध को कैसे देखती है;

  • संगठनात्मक बहुमत के प्रमाण को कितनी अहमियत देती है;

  • विधायी बहुमत और राजनीतिक दल की पहचान के बीच सीमा कैसे निर्धारित करती है;

  • और Election Commission के Paragraph 15 के अधिकार के दायरे को किस तरह परिभाषित करती है।

इन प्रश्नों के जवाब ही तय करेंगे कि यह मामला केवल शिवसेना की पहचान का फैसला बनता है या राजनीतिक दलों में विभाजन से जुड़े कानून के लिए व्यापक मिसाल भी तैयार करता है।

निष्कर्ष

सितंबर 2026 की सुप्रीम कोर्ट सुनवाई ने शिवसेना के नाम और धनुष-बाण चिन्ह की तीन साल से अधिक पुरानी कानूनी लड़ाई को फिर केंद्र में ला दिया है।

फिलहाल Election Commission के रिकॉर्ड में Shiv Sena के साथ Bow and Arrow और Shiv Sena (Uddhav Balasaheb Thackeray) के साथ Flaming Torch दर्ज है।

लेकिन मूल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की अंतिम न्यायिक समीक्षा अभी जारी है।

इसलिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल केवल यह नहीं है कि अंततः चुनाव चिन्ह किसके पास रहता है। उससे बड़ा संवैधानिक और चुनावी सवाल यह है कि किसी स्थापित राजनीतिक दल में विभाजन होने पर कानून उस पार्टी की वास्तविक पहचान कैसे तय करता है।


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