SIR पर Congress ने Amit Shah को घेरा
नई दिल्ली, 20 सितंबर 2026: मतदाता सूचियों के चल रहे Special Intensive Revision (SIR) को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने रविवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर निशाना साधते हुए SIR का नया अर्थ “Shah Instigated Removal” बताया और आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं।
कांग्रेस ने इस प्रक्रिया को संविधान पर हमला बताया है। हालांकि, यह कांग्रेस का राजनीतिक आरोप है और उपलब्ध स्रोतों में ऐसा कोई स्वतंत्र निष्कर्ष नहीं है कि अमित शाह व्यक्तिगत रूप से मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया निर्देशित कर रहे हैं। SIR निर्वाचन आयोग द्वारा संचालित मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया है।
Congress का दावा: पहले दो चरणों में 7.8 करोड़ नाम हटे
जयराम रमेश के अनुसार, SIR का पहला चरण जून 2025 में बिहार में शुरू हुआ था। इसके बाद नवंबर 2025 में नौ राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों में दूसरा चरण शुरू किया गया।
रमेश ने दावा किया कि पहले और दूसरे चरण में कुल 7.8 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए, जो SIR से पहले की मतदाता सूची में दर्ज नामों का करीब 13% है।
इन आंकड़ों को कांग्रेस ने अपनी आलोचना के समर्थन में पेश किया है। अलग-अलग राज्यों और चरणों में deletion का अर्थ मृत्यु, स्थायी स्थानांतरण, duplicate registration या eligibility से जुड़े अन्य कारण भी हो सकते हैं; इसलिए कुल deletion संख्या अपने-आप में wrongful deletion का प्रमाण नहीं है। निर्वाचन आयोग ने SIR में गलत तरीके से नाम हटने से रोकने के लिए notice, BLO verification, claims-objections और appeal जैसी प्रक्रियाओं का उल्लेख किया है।
तीसरे चरण में 6.18 करोड़ नाम हटने का दावा
कांग्रेस के मुताबिक SIR का तीसरा चरण 2026 के मध्य में 16 राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों में शुरू हुआ।
जयराम रमेश ने कहा कि अभी उपलब्ध 12 राज्यों और दो केंद्रशासित प्रदेशों के आंकड़ों में कुल 36.06 करोड़ मतदाताओं में से 6.18 करोड़ नाम हटाए गए हैं। उनके अनुसार यह 17% से अधिक की deletion rate है।
कांग्रेस नेता ने यह भी दावा किया कि 5.43 करोड़ मतदाताओं को अतिरिक्त दस्तावेज देने के लिए नोटिस जारी हुए हैं। उनका तर्क है कि इन दोनों श्रेणियों को मिलाने पर करीब 32% मतदाता या तो सूची से बाहर हो चुके हैं या उनके नाम पर आगे कार्रवाई का जोखिम है।
महत्वपूर्ण रूप से, अतिरिक्त दस्तावेज मांगा जाना अपने-आप में नाम हटाया जाना नहीं है। इसलिए 32% के आंकड़े को actual deletion rate की तरह नहीं पढ़ा जाना चाहिए।
Delhi से Telangana तक Congress ने दिए आंकड़े
रमेश ने विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि नाम हटने या हटने के जोखिम का अनुपात काफी अधिक है।
उनके अनुसार दिल्ली में यह आंकड़ा 53.73%, चंडीगढ़ में 52.58%, तेलंगाना में 48.90%, झारखंड में 39.57%, हरियाणा में 37.5%, उत्तराखंड में 35.71%, मेघालय में 35.36%, महाराष्ट्र में 33.88%, कर्नाटक में 27.6%, ओडिशा में 23.67%, आंध्र प्रदेश में 21.17% और पंजाब में 15.23% है।
ये आंकड़े जयराम रमेश द्वारा प्रस्तुत किए गए हैं और इन्हें उसी रूप में देखा जाना चाहिए, न कि प्रत्येक राज्य के लिए निर्वाचन आयोग द्वारा इस बयान के जवाब में स्वतंत्र रूप से सत्यापित अंतिम आंकड़ों के रूप में।
महिलाओं और कमजोर वर्गों को लेकर भी Congress का आरोप
कांग्रेस ने आरोप लगाया कि SIR के दौरान सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर समूहों पर deletions का असर असमान रूप से पड़ा है।
जयराम रमेश ने यह भी दावा किया कि ज्यादातर बड़े राज्यों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं के नाम अधिक संख्या में हटाए गए हैं। उपलब्ध रिपोर्टिंग में यह कांग्रेस का दावा है; इसे निर्वाचन आयोग द्वारा स्वीकार किए गए निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
कांग्रेस ने मतदाताओं के सामने अतिरिक्त दस्तावेज प्रस्तुत करने की आवश्यकता पर भी सवाल उठाया है और इसे eligible voters के लिए अतिरिक्त बाधा बताया है।
Karnataka में एक बूथ को लेकर भी उठा विवाद
SIR को लेकर कांग्रेस की चिंता केवल राष्ट्रीय आंकड़ों तक सीमित नहीं है। कर्नाटक कांग्रेस ने हाल में Bengaluru की Yeshvanthapura विधानसभा सीट के Part No. 512 का मामला उठाया था।
उसने राज्य के Chief Electoral Officer को लिखे पत्र में कहा कि इस बूथ के 1,016 मतदाताओं में से केवल 389 revision के बाद valid सूची में दिखाई दिए। पार्टी ने आरोप लगाया कि कुछ लोगों को गलत तरीके से permanently shifted, deceased या unmapped श्रेणी में रखा गया। कांग्रेस ने statewide review और अधिक पारदर्शिता की मांग की है।
ये भी कांग्रेस द्वारा उठाए गए आरोप हैं और संबंधित मतदाताओं की पात्रता का अंतिम निर्धारण वैधानिक प्रक्रिया के तहत होता है।
Election Commission की प्रक्रिया में क्या safeguards हैं?
सरकार द्वारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, निर्वाचन आयोग ने wrongful deletion रोकने के लिए कई safeguards बताए हैं।
इनमें BLO द्वारा घर-घर जाकर verification और किसी मतदाता को untraceable मानने से पहले कई प्रयास, नाम हटाने से पहले कारण दर्ज करना, draft electoral roll प्रकाशित करना, claims और objections के लिए वैधानिक अवधि तथा निर्णय के खिलाफ appeal की व्यवस्था शामिल है। राजनीतिक दल अपने Booth Level Agents (BLAs) के जरिए entries की जांच और discrepancies भी उठा सकते हैं।
सरकारी जवाब के अनुसार, Supreme Court ने 27 मई 2026 के एक फैसले में SIR को Representation of the People Act, 1950 के तहत निर्वाचन आयोग के वैधानिक अधिकार क्षेत्र के भीतर माना था।
इससे SIR की वैधानिकता और किसी विशेष deletion के सही या गलत होने के सवाल को अलग-अलग समझना जरूरी है।
Amit Shah पहले क्या कह चुके हैं?
अमित शाह ने इससे पहले लोकसभा में SIR पर विपक्ष के आरोपों को खारिज किया था। उन्होंने कहा था कि मतदाता सूची के revision का उद्देश्य मृत मतदाताओं, एक से अधिक जगह पंजीकृत लोगों और वोट देने के पात्र नहीं होने वाले व्यक्तियों के नाम हटाना तथा पात्र नए मतदाताओं को जोड़ना है। उन्होंने विपक्ष के आरोपों को गलत बताया था।
इसलिए मौजूदा विवाद में दोनों पक्षों के दावे अलग हैं: कांग्रेस बड़े पैमाने पर exclusions और transparency को लेकर सवाल उठा रही है, जबकि सरकार और निर्वाचन आयोग SIR को electoral rolls को अपडेट और सत्यापित करने की वैधानिक प्रक्रिया बताते हैं।
अब विवाद का मुख्य सवाल क्या है?
इस बहस का केंद्र केवल यह नहीं है कि मतदाता सूची से कितने नाम हटे। महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि किस कारण से नाम हटे, कितने eligible voters प्रभावित हुए, कितने लोगों को claims और appeals के जरिए वापस जोड़ा गया और प्रक्रिया अलग-अलग राज्यों में कितनी पारदर्शी रही।
कांग्रेस ने deletion और documentation के आंकड़ों को SIR की संरचनात्मक समस्या के संकेत के रूप में पेश किया है। दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग की घोषित प्रक्रिया में draft rolls, objections और appeals के जरिए गलत entries को सुधारने के प्रावधान मौजूद हैं।
इसलिए अंतिम मतदाता सूची और claims तथा appeals के नतीजे यह समझने के लिए महत्वपूर्ण होंगे कि शुरुआती revision में सामने आए आंकड़ों का eligible voters पर वास्तविक प्रभाव कितना रहा।
