SIR विवाद के बीच कांग्रेस ने तेज किया हमला
मतदाता सूचियों के Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर देश की राजनीति में टकराव बढ़ गया है।
कांग्रेस ने Chief Election Commissioner ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग दोहराते हुए Election Commission की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
5 अक्टूबर को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने पार्टी की तीन प्रमुख मांगों को “non-negotiable” बताया।
इनमें CEC ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा, SIR प्रक्रिया को रद्द करना और EVM के बजाय ballot papers से चुनाव कराना शामिल है।
कांग्रेस का कहना है कि वह INDIA bloc के सहयोगियों के साथ इन मांगों को लेकर अपना अभियान जारी रखेगी।
कांग्रेस की तीन प्रमुख मांगें क्या हैं?
मल्लिकार्जुन खड़गे ने चुनावी व्यवस्था को लेकर तीन मुख्य मांगें सामने रखी हैं।
पहली—Chief Election Commissioner ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें।
दूसरी—Special Intensive Revision को रद्द किया जाए।
तीसरी—चुनावों में electronic voting machines के बजाय ballot papers का इस्तेमाल किया जाए।
कांग्रेस इन मांगों को electoral transparency और voters के अधिकारों से जोड़ रही है।
हालांकि Election Commission और BJP विपक्ष द्वारा लगाए जा रहे राजनीतिक पक्षपात के आरोपों से इनकार करते रहे हैं।
कांग्रेस ने पहले CWC बैठक में भी उठाया था मुद्दा
यह मांग अचानक सामने नहीं आई है।
29 सितंबर को Congress Working Committee की बैठक में भी SIR और Election Commission के कामकाज को लेकर विस्तृत चर्चा हुई थी।
CWC ने CEC ज्ञानेश कुमार के तत्काल इस्तीफे की मांग की थी और SIR प्रक्रिया रोकने की मांग भी उठाई थी।
कांग्रेस ने दावा किया कि electoral rolls से लगभग 13.30 करोड़ नाम हटाए गए हैं और इन नामों को बहाल किया जाना चाहिए।
यह आंकड़ा कांग्रेस का दावा है। इसे स्वतंत्र रूप से अंतिम सत्यापित संख्या नहीं माना जाना चाहिए।
पार्टी ने electoral-roll changes से संबंधित पूरा data राजनीतिक दलों को उपलब्ध कराने और गंभीर विसंगतियों के मामलों में स्वतंत्र तथा समयबद्ध जांच की मांग भी की।
आखिर SIR क्या है?
Special Intensive Revision मतदाता सूची को व्यापक स्तर पर जांचने और अपडेट करने की प्रक्रिया है।
Election Commission का कहना है कि इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि electoral rolls में केवल पात्र मतदाता मौजूद रहें और मृत, स्थानांतरित, duplicate या अन्य अयोग्य entries को हटाया जा सके।
सैद्धांतिक रूप से voter-list revision चुनावी व्यवस्था का सामान्य और आवश्यक हिस्सा है।
विवाद इस बात को लेकर है कि यह प्रक्रिया किस तरीके से लागू की जा रही है और क्या दस्तावेजी आवश्यकताओं या deletions के कारण वास्तविक पात्र मतदाताओं के नाम भी सूची से बाहर हो सकते हैं।
विपक्ष के आरोप क्या हैं?
कांग्रेस और कई अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि SIR के जरिए बड़ी संख्या में eligible voters के नाम electoral rolls से हटाए जा सकते हैं।
विपक्ष ने यह भी आरोप लगाया है कि प्रक्रिया से BJP को चुनावी लाभ मिल सकता है।
ये राजनीतिक आरोप हैं और इन्हें सिद्ध तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
Election Commission और BJP दोनों ने इस आरोप को खारिज किया है कि voter-roll revision किसी राजनीतिक दल को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से किया जा रहा है।
Election Commission का पक्ष क्या है?
Election Commission का कहना है कि voter-list revision का उद्देश्य electoral rolls की शुद्धता सुनिश्चित करना है।
Commission के अनुसार, मतदाता सूची में गलत या अयोग्य entries हटाना और eligible voters की सही जानकारी बनाए रखना free and fair elections के लिए आवश्यक है।
हालिया विवाद में Election Commission के भीतर decision-making को लेकर भी सवाल उठे हैं।
The Indian Express की एक investigation में बताया गया कि Election Commissioners Sukhbir Singh Sandhu और Vivek Joshi ने पिछले लगभग 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर अलग-अलग प्रक्रियाओं या फैसलों को लेकर लिखित टिप्पणियां दर्ज की थीं।
Election Commission ने इन notes के अस्तित्व से इनकार नहीं किया, लेकिन उन्हें institutional decision-making process के दौरान दिए गए “suggestions” बताया।
Commission ने कहा कि पिछले वर्ष उसके सभी अंतिम फैसले unanimous रहे।
Form 6 को लेकर भी उठा विवाद
विवाद का एक महत्वपूर्ण हिस्सा Form 6 से जुड़ा है, जिसका इस्तेमाल electoral roll में नया नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है।
रिपोर्ट के अनुसार Election Commissioner Sukhbir Singh Sandhu ने अगस्त में एक बदलाव पर आपत्ति दर्ज करते हुए उसे “unauthorised and illegal” बताया था।
Election Commission ने internal notes को decision-making process का हिस्सा बताया है।
इस मुद्दे ने विपक्ष को यह सवाल उठाने का नया आधार दिया कि Election Commission के भीतर प्रक्रियाएं कितनी पारदर्शी हैं।
हालांकि internal disagreement या suggestion अपने आप यह साबित नहीं करता कि अंतिम electoral decision गैरकानूनी या राजनीतिक रूप से प्रेरित था।
Rahul Gandhi ने भी मांगा इस्तीफा
लोकसभा में Leader of Opposition राहुल गांधी भी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर चुके हैं।
उन्होंने SIR और voter rolls को लेकर Election Commission तथा केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
उनके आरोपों में electoral manipulation और लोकतांत्रिक संस्थाओं को नुकसान पहुंचाने जैसी बातें शामिल हैं।
ये कांग्रेस नेता के राजनीतिक आरोप हैं।
Election Commission और BJP ने ऐसी किसी मिलीभगत या चुनावी हेरफेर के आरोपों को स्वीकार नहीं किया है।
Delhi और Mumbai तक पहुंचा विरोध
SIR और CEC के खिलाफ विवाद अब केवल राजनीतिक बयानों तक सीमित नहीं है।
Delhi और Mumbai में विरोध प्रदर्शन हुए हैं, जहां विपक्षी कार्यकर्ताओं, युवा संगठनों और अन्य प्रदर्शनकारियों ने CEC के इस्तीफे और SIR को वापस लेने की मांग उठाई।
Mumbai में Uddhav Thackeray और Raj Thackeray भी विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए।
Reuters के अनुसार प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि voter-roll changes से बड़ी संख्या में eligible voters प्रभावित हो सकते हैं और इससे BJP को फायदा मिल सकता है।
Election Commission और BJP ने इस दावे को नकारा है।
INDIA Bloc भी बढ़ाएगा दबाव
विवाद आने वाले दिनों में और तेज हो सकता है।
INDIA bloc से जुड़े कई दलों ने Election Commission के खिलाफ coordinated protests की योजना बनाई है।
7 अक्टूबर को Delhi में Election Commission कार्यालय के बाहर प्रदर्शन की योजना भी सामने आई है।
इसका अर्थ है कि SIR विवाद अब administrative electoral-roll exercise से आगे बढ़कर एक बड़ा national political confrontation बन चुका है।
मुद्दा केवल एक CEC का नहीं
इस विवाद का व्यापक महत्व Election Commission जैसी संवैधानिक संस्था पर जनता के भरोसे से जुड़ा है।
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में electoral roll किसी भी चुनाव की बुनियाद है।
यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटता है, तो उसके मतदान के अधिकार पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है।
दूसरी ओर electoral rolls में duplicate, मृत या अयोग्य entries बने रहना भी चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकता है।
इसलिए वास्तविक चुनौती revision को रोकना या जारी रखना भर नहीं है।
महत्वपूर्ण सवाल यह है कि voter-list verification ऐसी प्रक्रिया से हो जो transparent, verifiable और eligible voters के लिए आसानी से accessible हो।
क्या CEC को इस्तीफा देना होगा?
कांग्रेस की मांग अपने आप CEC के इस्तीफे में नहीं बदलती।
Chief Election Commissioner एक संवैधानिक पद है और उसके removal के लिए विशेष संवैधानिक प्रक्रिया निर्धारित है।
मार्च 2026 में 130 Lok Sabha MPs द्वारा ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए दिया गया एक motion notice भी सामने आया था।
Lok Sabha Speaker ने उस notice को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था।
इसलिए वर्तमान राजनीतिक मांग और CEC को पद से कानूनी रूप से हटाने की प्रक्रिया को अलग-अलग समझना जरूरी है।
संतुलित नजरिए से विवाद को कैसे देखें?
SIR को लेकर विपक्ष द्वारा उठाए गए सवाल गंभीर हैं क्योंकि वे सीधे voting rights और electoral integrity से जुड़े हैं।
लेकिन राजनीतिक आरोप अपने आप प्रमाण नहीं बन जाते।
इसी तरह Election Commission द्वारा किसी आरोप को खारिज कर देना भी public scrutiny की जरूरत समाप्त नहीं करता।
विश्वसनीय निष्कर्ष के लिए electoral-roll data, deletion और addition records, appeal mechanisms, Commission के documented decisions और अदालतों में सामने आने वाले evidence को देखना महत्वपूर्ण होगा।
आगे क्या?
आने वाले दिनों में तीन घटनाक्रम महत्वपूर्ण होंगे।
पहला, INDIA bloc और दूसरे संगठनों के प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन।
दूसरा, SIR को लेकर न्यायिक कार्यवाही और अदालतों की टिप्पणियां।
तीसरा, Election Commission की ओर से electoral-roll changes और internal decision-making पर आने वाली अतिरिक्त जानकारी।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि Congress ने CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और SIR cancellation को अपनी प्रमुख राजनीतिक मांगों में शामिल कर लिया है।
अब यह विवाद केवल voter-list revision तक सीमित नहीं रहा—यह Election Commission की institutional credibility और भारत की electoral process पर व्यापक राजनीतिक बहस में बदल चुका है।
