विज्ञापन - शीर्ष बैनर
Read in English —JantaScope English
राजनीति

तमिलनाडु के झंडे की मांग पर सियासी घमासान, कर्नाटक भी अपने ध्वज को देगा आधिकारिक पहचान; BJP ने उठाए सवाल।

तमिलनाडु और कर्नाटक में अलग राज्य ध्वज को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। तमिलनाडु में मुख्यमंत्री जोसेफ विजय की सरकार के मंत्री आधव अर्जुन ने राज्य के लिए अलग झंडा बनाने की मांग उठाई है। वहीं, कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने लाल-पीले कन्नड़ ध्वज को आधिकारिक पहचान दिलाने की दिशा में कदम बढ़ाने का ऐलान किया है। दोनों राज्यों में भाषा, संस्कृति और क्षेत्रीय पहचान से जुड़े इस मुद्दे ने राष्ट्रीय राजनीति का ध्यान खींचा है।

तमिलनाडु के झंडे की मांग पर सियासी घमासान, कर्नाटक भी अपने ध्वज को देगा आधिकारिक पहचान; BJP ने उठाए सवाल।
विज्ञापन

द्वारा साधना गुप्ता

स्रोत: India Today, The New Indian Express, Moneycontrol, The Indian Express, The Economic Times, Press Information Bureau (PIB), Ministry of Home Affairs.

तमिलनाडु में अलग झंडे की मांग सामने आने के बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इस पर आपत्ति जताई है। पार्टी के नेताओं का कहना है कि क्षेत्रीय पहचान को राष्ट्रीय पहचान के विरोध में खड़ा नहीं किया जाना चाहिए। दूसरी तरफ, राज्य सरकार से जुड़े नेताओं का तर्क है कि अपना सांस्कृतिक प्रतीक होना भारतीय एकता के खिलाफ नहीं है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या राज्यों के अपने झंडे को आधिकारिक मान्यता मिल सकती है और इसके लिए संवैधानिक व कानूनी प्रक्रिया क्या होगी?

तमिलनाडु के मंत्री आधव अर्जुन ने उठाई अलग झंडे की मांग

तमिलनाडु में अलग राज्य ध्वज की मांग 1 नवंबर 2026 को राज्य स्थापना दिवस के कार्यक्रम के दौरान चर्चा में आई। तमिलनाडु के लोक निर्माण और खेल मंत्री आधव अर्जुन ने कहा कि राज्य की अपनी अलग पहचान दर्शाने वाला झंडा बनाया जाना चाहिए। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय सबसे पहले इस झंडे को फहराएं और इसे राज्य के प्रत्येक घर तक पहुंचाया जाए। मंत्री ने यह भी कहा कि राज्य के झंडे को राष्ट्रीय ध्वज के समान महत्व मिलना चाहिए। उनके अनुसार, 18 जुलाई और 1 नवंबर जैसे महत्वपूर्ण दिनों पर इस ध्वज को विशेष रूप से फहराया जा सकता है।

यह मांग केवल एक नए प्रतीक को तैयार करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे तमिल भाषा, इतिहास और क्षेत्रीय सांस्कृतिक पहचान को अधिक प्रमुखता देने की सोच भी जुड़ी हुई है। तमिलनाडु के मंत्री ए. राजमोहन ने भी इस प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सरकार इस विषय पर विचार करेगी। उन्होंने संकेत दिया कि मुख्यमंत्री विशेषज्ञों से चर्चा करने के बाद इस संबंध में निर्णय ले सकते हैं। हालांकि, अभी अलग झंडे के डिजाइन या उसे लागू करने का कोई अंतिम सरकारी फैसला घोषित नहीं हुआ है।

BJP ने अलग झंडे की मांग पर जताई आपत्ति

तमिलनाडु में अलग झंडे की मांग सामने आने के बाद BJP नेता विनोज पी. सेल्वम ने इस पर सवाल उठाए। उन्होंने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि तमिल भाषा और संस्कृति की पहचान राष्ट्रीय तिरंगे के नीचे भी उतनी ही मजबूत है।

उनका तर्क है कि तमिल और भारतीय पहचान को एक-दूसरे के विरोध में पेश नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने मंत्री की मांग को अलगाववादी सोच को बढ़ावा देने वाला बयान बताते हुए कहा कि क्षेत्रीय पहचान को मजबूत करने के लिए अलग झंडे की आवश्यकता साबित करना जरूरी नहीं है।

BJP नेता ने सरकार से यह भी सवाल किया कि तमिल भाषा के प्रचार के साथ-साथ तमिल माध्यम के विद्यार्थियों, युवाओं के रोजगार, तमिल भाषा में शोध और उद्यमियों के अवसरों के लिए क्या ठोस योजनाएं बनाई जा रही हैं।

इस तरह अलग राज्य ध्वज का मुद्दा अब केवल सांस्कृतिक पहचान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके साथ भाषा नीति, रोजगार और राज्य सरकार की प्राथमिकताओं पर भी राजनीतिक बहस शुरू हो गई है।

कर्नाटक में लाल-पीले झंडे को आधिकारिक पहचान देने की तैयारी

तमिलनाडु में अलग झंडे की मांग के बीच कर्नाटक में भी इसी तरह का मुद्दा सामने आया है। मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने 1 नवंबर को 71वें कर्नाटक राज्योत्सव के अवसर पर घोषणा की कि उनकी सरकार लाल और पीले रंग वाले कन्नड़ ध्वज को आधिकारिक राज्य ध्वज का दर्जा दिलाने की दिशा में काम कर रही है।

बेंगलुरु के कांतीरवा स्टेडियम में आयोजित समारोह के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि इस प्रस्ताव पर दिसंबर में बेलगावी में होने वाले विधानसभा के शीतकालीन सत्र में चर्चा की जाएगी। सरकार इस मामले के कानूनी पहलुओं की जांच कर रही है और इसके लिए आवश्यक दिशा-निर्देश तैयार करने पर विचार कर रही है।

शिवकुमार के अनुसार, सरकार चाहती है कि सरकारी भवनों और राज्य से सहायता प्राप्त करने वाले संस्थानों में कन्नड़ ध्वज फहराने की व्यवस्था को लेकर स्पष्ट नियम बनाए जाएं। निजी संस्थानों में भी ध्वज प्रदर्शित करने के संबंध में सरकार विचार कर रही है। उन्होंने कन्नड़ ध्वज को राज्य की भाषा, संस्कृति, इतिहास और लोगों की भावनाओं से जुड़ा प्रतीक बताया। हालांकि, इसे आधिकारिक दर्जा देने की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है।

1970 से जुड़ा है तमिलनाडु के अलग झंडे का इतिहास

तमिलनाडु में अलग राज्य ध्वज की मांग कोई नई राजनीतिक पहल नहीं है। इसका इतिहास करीब पांच दशक पुराना है। वर्ष 1970 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि की सरकार ने राज्य के लिए अलग झंडे का प्रस्ताव तैयार किया था।

उस समय प्रस्तावित झंडे का रंग ग्रे था। इसके ऊपरी बाएं हिस्से में भारतीय तिरंगा और मुख्य हिस्से में राज्य का मंदिर के गोपुरम वाला प्रतीक शामिल किया गया था। करुणानिधि ने दिल्ली में इस प्रस्तावित झंडे को पत्रकारों के सामने भी प्रदर्शित किया था।

उनका तर्क था कि राज्य का अपना झंडा होने से राष्ट्रीय एकता या तिरंगे के सम्मान पर कोई असर नहीं पड़ेगा। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस प्रस्ताव पर अन्य मुख्यमंत्रियों से चर्चा करने की बात कही थी। हालांकि, उस समय इसे अंतिम मंजूरी नहीं मिली और प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका।

अब आधव अर्जुन के बयान के बाद यह पुराना मुद्दा एक बार फिर तमिलनाडु की राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है।

2018 में भी कर्नाटक ने केंद्र को भेजा था झंडे का प्रस्ताव

कर्नाटक में अलग झंडे को आधिकारिक मान्यता दिलाने की कोशिश भी पहले हो चुकी है। वर्ष 2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की सरकार ने राज्य के लिए एक अलग झंडे का प्रस्ताव तैयार किया था।

उस समय प्रस्तावित डिजाइन में पीले, सफेद और लाल रंग की तीन क्षैतिज पट्टियां थीं। इसके बीच में कर्नाटक का राजकीय प्रतीक गंडभेरुंड शामिल किया गया था। राज्य सरकार ने इस प्रस्ताव को केंद्र के पास भेजकर मान्यता मांगी थी, लेकिन इसे अंतिम स्वीकृति नहीं मिली।

अब मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार की सरकार पारंपरिक लाल-पीले कन्नड़ ध्वज को आधिकारिक पहचान दिलाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहती है। सरकार दिसंबर के विधानसभा सत्र में इस विषय पर चर्चा करने और कानूनी प्रक्रिया तय करने की तैयारी कर रही है।

क्या संविधान राज्यों को अलग झंडा रखने की अनुमति देता है?

अलग राज्य ध्वज को लेकर सबसे महत्वपूर्ण सवाल भारतीय संविधान और राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े नियमों का है।

भारतीय संविधान में राज्यों के अलग झंडे के लिए कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं दिया गया है। हालांकि, संविधान में राज्यों के लिए अलग झंडा रखने पर स्पष्ट प्रतिबंध भी दर्ज नहीं है। जनवरी 2018 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने लोकसभा में बताया था कि संविधान में किसी राज्य के अलग झंडे का उल्लेख नहीं है।

इसके अलावा, भारतीय ध्वज संहिता (Flag Code of India) राष्ट्रीय ध्वज के प्रदर्शन और सम्मान से जुड़े नियम निर्धारित करती है। इन नियमों के अनुसार, किसी अन्य झंडे को राष्ट्रीय ध्वज से ऊपर या उसके समान स्तर पर प्रदर्शित नहीं किया जा सकता। राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा और निर्धारित प्रोटोकॉल का पालन करना अनिवार्य है।

इसलिए किसी राज्य के अलग झंडे को आधिकारिक पहचान देने का सवाल केवल राजनीतिक घोषणा से हल नहीं होगा। इसके लिए राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े नियमों, कानूनी प्रावधानों और केंद्र तथा राज्य सरकारों के बीच अधिकारों की स्पष्टता जरूरी होगी।

क्षेत्रीय पहचान बनाम राष्ट्रीय एकता, आगे क्या होगा?

तमिलनाडु और कर्नाटक में अलग राज्य ध्वज को लेकर उठी मांग ने एक बार फिर भारतीय संघीय व्यवस्था में राज्यों की सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन की चर्चा शुरू कर दी है। तमिलनाडु में मुख्यमंत्री जोसेफ विजय की सरकार इस प्रस्ताव पर विचार करने की बात कह रही है, जबकि कर्नाटक सरकार दिसंबर के विधानसभा सत्र में अपने ध्वज को आधिकारिक पहचान देने से जुड़े पहलुओं पर चर्चा करना चाहती है।

आने वाले समय में दोनों राज्यों की सरकारों के फैसले इस मुद्दे की दिशा तय करेंगे। खास तौर पर कर्नाटक में प्रस्तावित विधानसभा चर्चा और तमिलनाडु में विशेषज्ञों से होने वाला विचार-विमर्श महत्वपूर्ण रहेगा। फिलहाल यह स्पष्ट है कि अलग राज्य ध्वज की मांग को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद हैं। एक पक्ष इसे भाषा और संस्कृति की पहचान से जोड़ रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में देख रहा है। अब देखना होगा कि सरकारें इन मांगों को कानूनी रूप देने के लिए क्या कदम उठाती हैं और केंद्र सरकार इस पर क्या रुख अपनाती है।

साझा करें
विज्ञापन - मध्य लेख
विज्ञापन - नीचे