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राजनीति

तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा मोड़: AIADMK के छह पूर्व विधायकों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, विजय की TVK को राहत

तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव के बाद हुए दल-बदल को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। अन्नाद्रमुक (AIADMK) के छह पूर्व विधायकों के इस्तीफे और सत्तारूढ़ तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) में शामिल होने से जुड़ी याचिका सोमवार, 26 अक्टूबर को खारिज कर दी गई। इस फैसले को मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की पार्टी के लिए राहत माना जा रहा है। हालांकि, विधायकों की अयोग्यता से जुड़ी अलग कार्यवाही अभी पूरी नहीं हुई है।

तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा मोड़: AIADMK के छह पूर्व विधायकों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, विजय की TVK को राहत
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द्वारा साधना गुप्ता

स्रोत: ndtv, PTI, bAR N BENCH, LIVE LAW.

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?

तमिलनाडु की राजनीति में विधानसभा चुनाव के बाद हुए राजनीतिक बदलाव एक बार फिर चर्चा में हैं। देश की सर्वोच्च अदालत ने उन छह पूर्व AIADMK विधायकों से जुड़े विवाद में हस्तक्षेप करने से इनकार किया है, जिन्होंने अपनी पार्टी के निर्देशों के खिलाफ मतदान करने के बाद विधानसभा की सदस्यता छोड़ दी थी। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने की।

सुनवाई के दौरान अदालत ने टिप्पणी की कि किसी निर्वाचित प्रतिनिधि का इस्तीफा देकर मंत्री बनना राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है। अदालत ने संबंधित मामले में नया आदेश देने से इनकार किया।

यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि याचिका में विधायकों के इस्तीफों के पीछे राजनीतिक उद्देश्य होने और दल-बदल विरोधी कानून से बचने की कोशिश का आरोप लगाया गया था।

क्या है छह विधायकों के दल-बदल का पूरा मामला?

विवाद की शुरुआत तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के बाद हुई। AIADMK के टिकट पर निर्वाचित छह विधायकों ने विधानसभा में पार्टी व्हिप के विपरीत मतदान किया था।

इसके बाद इन विधायकों ने अलग-अलग तारीखों पर विधानसभा से इस्तीफा दिया और मुख्यमंत्री विजय के नेतृत्व वाली TVK में शामिल हो गए। मामले से जुड़े छह पूर्व विधायकों के नाम एस. जयकुमार, मरगथम कुमारवेल, पी. सत्यभामा, एसक्की सुबैया, सी. विजयभास्कर और एम.आर. विजयभास्कर हैं। याचिकाकर्ता का आरोप था कि इस तरह इस्तीफा देकर दूसरी राजनीतिक पार्टी में शामिल होने से दल-बदल विरोधी कानून के प्रभाव से बचने का रास्ता खुल सकता है। हालांकि, इन आरोपों को अदालत द्वारा सिद्ध अपराध नहीं माना गया है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला मुख्य रूप से न्यायिक हस्तक्षेप की मांग और उपलब्ध कानूनी प्रक्रियाओं से जुड़ा है।

याचिका में पांच साल की अयोग्यता और चुनाव खर्च की मांग

इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू चुनावों पर होने वाला सार्वजनिक खर्च भी है। मद्रास हाईकोर्ट में पहले दायर जनहित याचिका में मांग की गई थी कि स्वेच्छा से इस्तीफा देने के बाद दोबारा चुनाव लड़ने वाले जनप्रतिनिधियों के लिए विशेष वित्तीय व्यवस्था बनाई जाए। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत ऐसे उम्मीदवारों से उपचुनाव कराने में होने वाले सरकारी खर्च के बराबर राशि जमा कराने की मांग की गई थी। इसके अतिरिक्त छह पूर्व विधायकों को पांच वर्ष तक चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने की मांग भी उठाई गई थी। मद्रास हाईकोर्ट ने 24 सितंबर 2026 को संबंधित जनहित याचिका खारिज करते हुए कहा था कि विधानसभा से इस्तीफा देने का अधिकार संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है। न्यायिक आदेश के जरिए इस अधिकार पर कानून में मौजूद न होने वाली अतिरिक्त शर्तें नहीं लगाई जा सकतीं।

दल-बदल विरोधी कानून पर फिर उठे सवाल

भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची में दल-बदल विरोधी कानून का प्रावधान है। इसका उद्देश्य निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा राजनीतिक निष्ठा बदलने से उत्पन्न अस्थिरता को रोकना है। सामान्यतः किसी विधायक के अपनी पार्टी की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ने या निर्धारित परिस्थितियों में पार्टी व्हिप का उल्लंघन करने पर अयोग्यता का प्रश्न उठ सकता है। लेकिन तमिलनाडु का यह मामला इसलिए अलग है क्योंकि संबंधित विधायकों ने पहले इस्तीफा दिया और फिर दूसरी पार्टी में शामिल हुए।

मद्रास हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया था कि इस्तीफा स्वीकार होना और दल-बदल के आधार पर अयोग्यता का निर्धारण दो अलग संवैधानिक प्रक्रियाएं हैं। इस्तीफा स्वीकार कर लेने से पहले से लंबित अयोग्यता संबंधी कार्यवाही अपने आप समाप्त नहीं होती।

विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर अब नजर

सुप्रीम कोर्ट में याचिका खारिज होने के बावजूद इस विवाद के सभी कानूनी पहलू समाप्त नहीं हुए हैं। मद्रास हाईकोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष को लंबित अयोग्यता याचिकाओं पर दो महीने के भीतर फैसला लेने का निर्देश दिया था। 23 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, विधानसभा अध्यक्ष के निर्धारित कार्यक्रम में 10 से 12 नवंबर के बीच गवाहों से जिरह और 17 नवंबर को अंतिम दलीलें सुनने की तारीख तय की गई है। अंतिम आदेश की तारीख अभी निर्धारित नहीं है। इसलिए आगे का कानूनी घटनाक्रम तमिलनाडु की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण बना रहेगा।

कथित खरीद-फरोख्त की जांच का रास्ता खुला

मामले में विधायकों के दल-बदल के पीछे कथित राजनीतिक खरीद-फरोख्त के आरोप भी लगाए गए थे। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बताया गया कि संबंधित आरोपों को लेकर पहले ही प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी है। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि प्राथमिकी की जांच संबंधित प्रक्रिया के अनुसार होनी चाहिए और कानून अपना काम करेगा। इस टिप्पणी से स्पष्ट है कि याचिका खारिज होने को कथित अनियमितताओं की जांच समाप्त होने के समान नहीं माना जा सकता। किसी भी आपराधिक आरोप का निर्धारण उपलब्ध साक्ष्यों और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही होगा।

विजय की TVK और AIADMK के लिए क्या मायने?

मुख्यमंत्री विजय की TVK के लिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला तत्काल राजनीतिक राहत के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष लंबित कार्यवाही भविष्य में नई कानूनी चुनौतियां पैदा कर सकती है। दूसरी ओर, AIADMK के लिए अपने पूर्व विधायकों का सत्तारूढ़ दल में शामिल होना संगठनात्मक अनुशासन और विपक्ष की रणनीति से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है। मदुरंतकम और धारापुरम सीटों पर मरगथम कुमारवेल तथा पी. सत्यभामा अक्टूबर के उपचुनाव में TVK उम्मीदवार के रूप में दोबारा निर्वाचित हो चुकी हैं। इससे विवाद का चुनावी महत्व और बढ़ गया है।

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