विज्ञापन - शीर्ष बैनर
Read in English —JantaScope English
राजनीति

उमर अब्दुल्ला का मंत्रिमंडल विस्तार: कश्मीर की बढ़ी हिस्सेदारी, जम्मू के प्रतिनिधित्व पर बहस

जम्मू-कश्मीर में उमर अब्दुल्ला सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार ने जिम्मेदारियों के बंटवारे से आगे बढ़कर क्षेत्रीय हिस्सेदारी की बहस छेड़ दी है। 27 अक्टूबर 2026 को चार नए मंत्रियों ने शपथ ली, जबकि छंब से निर्दलीय विधायक सतीश शर्मा को मंत्रिपरिषद से हटा दिया गया। सभी नए मंत्री कश्मीर घाटी से हैं। इससे सवाल उठा है कि सरकार की नई संरचना जम्मू और कश्मीर की अलग-अलग अपेक्षाओं के बीच कितना संतुलन बना पाएगी।

उमर अब्दुल्ला का मंत्रिमंडल विस्तार: कश्मीर की बढ़ी हिस्सेदारी, जम्मू के प्रतिनिधित्व पर बहस
विज्ञापन

द्वारा साधना गुप्ता

स्रोत: economic times, tribute indian. money controll , indian express, india code.

चार नए मंत्रियों ने ली शपथ

श्रीनगर के लोक भवन में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने अली मोहम्मद सागर, सैफुल्लाह मीर, शमीम फिरदौस और अल्ताफ अहमद वानी को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। चारों नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायक हैं। सागर श्रीनगर की खानयार और फिरदौस हब्बाकदल सीट से विधायक हैं। मीर उत्तरी कश्मीर की त्रेहगाम सीट से विधायक हैं, जबकि वानी दक्षिण कश्मीर के पहलगाम से आते हैं। इस चयन से घाटी के विभिन्न हिस्सों की मौजूदगी मजबूत हुई है।

जम्मू और कश्मीर की हिस्सेदारी में बदलाव

विस्तार के बाद मुख्यमंत्री सहित नौ सदस्यीय मंत्रिपरिषद में कश्मीर से सात और जम्मू संभाग से दो सदस्य हैं। उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी और जावेद राणा जम्मू संभाग का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इसलिए यह कहना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा कि जम्मू का प्रतिनिधित्व समाप्त हो गया। वास्तविक बदलाव यह है कि पहले छह सदस्यों वाली मंत्रिपरिषद में दोनों संभागों से तीन-तीन सदस्य थे; अब जम्मू की संख्या घटी और कश्मीर की बढ़ी है।

सतीश शर्मा का बाहर होना इसी कारण राजनीतिक विवाद का केंद्र बना। द ट्रिब्यून के अनुसार, उनकी विदाई के बाद जम्मू, सांबा, कठुआ और उधमपुर जिलों की पट्टी से मंत्रिपरिषद में कोई सदस्य नहीं बचा। यहां जम्मू संभाग और उसके भीतर के अलग-अलग इलाकों का फर्क समझना जरूरी है। किसी बड़े क्षेत्र के दो मंत्री होना यह सुनिश्चित नहीं करता कि उसके सभी उपक्षेत्र सत्ता में भागीदारी महसूस करेंगे।

क्षेत्रीय संतुलन पर विपक्ष के सवाल

विधानसभा में विपक्ष के नेता सुनील शर्मा ने विस्तार पर क्षेत्रीय और सांस्कृतिक असंतुलन का आरोप लगाया। भाजपा नेता चौधरी जुल्फकार अली ने भी सतीश शर्मा को हटाने और वरिष्ठ विधायकों की अनदेखी पर सवाल उठाए। ये विपक्ष के राजनीतिक आरोप हैं, जिन्हें सरकारी भेदभाव के प्रमाण के रूप में पेश नहीं किया जा सकता। हालांकि, इन प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट है कि मंत्री पदों का बंटवारा सरकार की जवाबदेही का प्रमुख मुद्दा बन सकता है।

नौ मंत्रियों की सीमा और राजनीतिक चुनौती

मुख्यमंत्री के सामने विकल्पों की सीमा भी वास्तविक है। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 की धारा 53 मंत्रिपरिषद का आकार विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के दस प्रतिशत तक सीमित करती है। मौजूदा 90 निर्वाचित सीटों वाली व्यवस्था में मुख्यमंत्री सहित अधिकतम नौ मंत्री हो सकते हैं। विस्तार से पहले तीन पद खाली थे; सतीश शर्मा के हटने से चौथी नियुक्ति की जगह बनी। इसलिए हर इच्छुक विधायक या उपक्षेत्र को मंत्री पद देना संभव नहीं था।

लेकिन सीमित पद राजनीतिक संतुलन का प्रश्न खत्म नहीं करते। इंडियन एक्सप्रेस की विस्तार से पहले की रिपोर्ट में वरिष्ठ नेताओं, युवा विधायकों और विभिन्न क्षेत्रों की आकांक्षाओं को मुख्यमंत्री की चुनौती बताया गया था। नए चयन में अनुभवी नेताओं को जगह मिलने से संगठन को लाभ हो सकता है। प्रशासनिक क्षमता और जनसमस्याओं के समाधान पर इसका असर मंत्रियों के कामकाज से स्पष्ट होगा।

नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर भी असंतोष

विस्तार ने पार्टी के भीतर भी सभी अपेक्षाएं पूरी नहीं कीं। इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक, मुबारक गुल, अब्दुल मजीद लारमी और नजीर गुरेजी जैसे नेताओं ने जगह नहीं मिलने पर निराशा जताई। गुल के समर्थकों ने विरोध भी किया। इससे संकेत मिलता है कि चुनौती केवल जम्मू बनाम कश्मीर तक सीमित नहीं है। घाटी के भीतर संगठनात्मक वरिष्ठता, स्थानीय प्रभाव और राजनीतिक अवसरों के वितरण को लेकर भी असंतोष मौजूद है।

कांग्रेस का रुख और सरकार की प्राथमिकताएँ

कांग्रेस का सरकार से बाहर रहना इस समीकरण का दूसरा पहलू है। गठबंधन सहयोगी पार्टी ने जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल होने तक मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होने का रुख बरकरार रखा है। उधर, नए मंत्रियों से मुलाकात के दौरान उमर अब्दुल्ला ने विकास, जनकल्याण और सामूहिक प्रयासों पर जोर दिया। इस तरह सरकार विस्तार को बेहतर कामकाज की दिशा में कदम बता रही है, जबकि आलोचक उसकी प्रतिनिधित्व संबंधी प्राथमिकताओं पर प्रश्न उठा रहे हैं।

विकास और जनविश्वास पर होगी असली परीक्षा

इस घटनाक्रम का मूल्यांकन दो अलग कसौटियों पर होना चाहिए। पहली, मंत्रिपरिषद की संरचना नागरिकों में भागीदारी और भरोसे का कितना भाव पैदा करती है। दूसरी, सरकारी निर्णयों से किन जिलों और समुदायों को लाभ मिलता है। मंत्री का किसी क्षेत्र से होना राजनीतिक महत्व रखता है, लेकिन केवल उसी आधार पर विकास या उपेक्षा का अंतिम निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए बजट, परियोजनाओं और सेवाओं के तुलनात्मक आंकड़े देखने होंगे।

आगे सरकार के लिए उपयोगी रास्ता जिला स्तर पर विकास खर्च, परियोजनाओं की प्रगति और जनशिकायतों के निस्तारण की जानकारी सार्वजनिक करना होगा। मंत्रियों की नियमित क्षेत्रीय बैठकों से भी दूरी घट सकती है। फिलहाल विस्तार ने सरकार की टीम पूरी कर दी है, लेकिन प्रतिनिधित्व की बहस खुली हुई है। उसका उत्तर केवल मंत्रियों के नामों से नहीं, बल्कि जम्मू और कश्मीर के नागरिकों तक पहुंचने वाले काम और संवाद से मिलेगा।

साझा करें
विज्ञापन - मध्य लेख
विज्ञापन - नीचे