2029 को लेकर क्या है नया प्रस्ताव?
भारत में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की लंबे समय से चल रही बहस अब 2029 के चुनावी चक्र पर केंद्रित होती दिखाई दे रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, NDA के स्तर पर एक ऐसा विकल्प चर्चा में है जिसके तहत गठबंधन के शासन वाले 22 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के विधानसभा चुनावों को 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ जोड़ा जा सकता है। इनमें से 11 राज्यों/UTs में अगले दो वर्षों के दौरान विधानसभा चुनाव होने हैं।
यह विचार इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ की दिशा में 2029 को एक बड़े शुरुआती चरण के रूप में इस्तेमाल करने की संभावना बन सकती है।
लेकिन इसे अभी तय कार्यक्रम नहीं माना जाना चाहिए। संसदीय समिति संबंधित विधेयकों और संभावित व्यवस्था पर विचार-विमर्श कर रही है तथा राज्यों और अन्य हितधारकों से चर्चा जारी है।
विधानसभा कार्यकाल में बदलाव बन सकता है बड़ा मुद्दा
2029 में बड़ी संख्या में विधानसभा चुनावों को लोकसभा चुनाव के साथ जोड़ने की सबसे बड़ी व्यावहारिक चुनौती अलग-अलग राज्यों के मौजूदा चुनावी चक्र हैं।
कुछ विधानसभाओं का कार्यकाल 2029 से पहले समाप्त होगा, जबकि कुछ का चुनावी कार्यक्रम अलग समय पर होगा। इसलिए चुनावों को एक चक्र में लाने के लिए कुछ राज्यों में चुनाव की तारीख और विधानसभा के कार्यकाल से जुड़े संवैधानिक सवाल सामने आ सकते हैं।
संसदीय समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी पहले कह चुके हैं कि यदि राजनीतिक दल और मुख्यमंत्री स्वेच्छा से चुनावी चक्र को एक साथ लाने पर सहमत होते हैं तो कुछ राज्यों को 2029 से पहले भी सिंक्रोनाइज करने की संभावना पर विचार किया जा सकता है।
यही कारण है कि इस योजना का भविष्य केवल केंद्र सरकार की इच्छा पर नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था, राज्यों की भूमिका और राजनीतिक सहमति पर भी निर्भर करेगा।
संसद की संयुक्त समिति कर रही है प्रस्ताव की समीक्षा
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ से जुड़े संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 पर संसद की संयुक्त समिति विचार कर रही है।
समिति अलग-अलग राज्यों में जाकर राजनीतिक प्रतिनिधियों, कानूनी विशेषज्ञों, शिक्षाविदों, नागरिक संगठनों और दूसरे हितधारकों से राय ले रही है। जुलाई 2026 में गोवा में हुई समिति की बैठकों में भी प्रस्ताव के व्यावहारिक और प्रक्रियात्मक पहलुओं पर चर्चा हुई थी।
समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने जुलाई में कहा था कि ऐसा तंत्र तैयार करने पर काम हो रहा है जिससे प्रस्तावित व्यवस्था 2029 के आम चुनाव तक लागू हो सके।
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का मूल विचार क्या है?
इस व्यवस्था का मूल उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को एक ही चुनावी चक्र में लाना है।
इसका अर्थ यह जरूरी नहीं है कि पूरे देश में सभी मतदान एक ही दिन होंगे। संसदीय समिति के अध्यक्ष के मुताबिक, मतदान चुनाव आयोग की सुविधा के अनुसार अलग-अलग चरणों में भी कराया जा सकता है, लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनावों का चुनावी समय एक साथ रखा जाएगा।
पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति ने भी चरणबद्ध मॉडल की सिफारिश की थी। पहले चरण में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने तथा बाद में नगरपालिकाओं और पंचायत चुनावों को इसके साथ समन्वित करने की सिफारिश की गई थी।
समर्थकों का तर्क: चुनावी खर्च और व्यवधान हो सकता है कम
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के समर्थकों का कहना है कि भारत में अलग-अलग समय पर लगातार चुनाव होने से प्रशासन, सुरक्षा व्यवस्था और सरकारी संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
सरकार और प्रस्ताव के समर्थकों का तर्क है कि बार-बार लागू होने वाली आदर्श आचार संहिता सरकारी कामकाज और विकास योजनाओं की गति को प्रभावित कर सकती है। एक साथ चुनाव कराने से प्रशासन को लंबी अवधि तक नीतियों के क्रियान्वयन पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर मिल सकता है।
रामनाथ कोविंद समिति के सामने कुछ उद्योग संगठनों और अर्थशास्त्रियों ने भी बार-बार होने वाले चुनावों के आर्थिक प्रभाव को लेकर अपनी चिंताएं रखी थीं।
विरोधियों की चिंता: संघवाद और राज्यों की राजनीतिक स्वायत्तता
इस प्रस्ताव को लेकर विपक्ष की गंभीर आपत्तियां भी रही हैं।
कांग्रेस ने 2024 के अपने घोषणापत्र में ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के विचार को अस्वीकार करते हुए कहा था कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव उनके निर्धारित संवैधानिक समय के अनुसार होने चाहिए।
आलोचकों की बड़ी चिंता संघीय व्यवस्था और राज्यों के स्वतंत्र राजनीतिक जनादेश को लेकर है। सवाल यह भी है कि यदि किसी सरकार का कार्यकाल समय से पहले समाप्त हो जाता है तो उसके बाद बनने वाली सरकार का कार्यकाल कैसे तय किया जाएगा और संयुक्त चुनावी चक्र को कैसे बनाए रखा जाएगा।
इसी कारण चुनावी खर्च कम करने जैसे संभावित लाभों के साथ संवैधानिक स्थिरता, राज्यों के अधिकार और मतदाताओं के जनादेश जैसे पहलुओं पर भी बहस जारी है।
2029 क्यों बन सकता है महत्वपूर्ण चुनावी मोड़?
यदि NDA अपने शासन वाले राज्यों के चुनावी चक्र को 2029 लोकसभा चुनाव के साथ जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ता है, तो यह भारत की चुनाव प्रणाली में बड़े बदलाव की शुरुआत साबित हो सकता है।
हालांकि इस रास्ते में कई कानूनी और राजनीतिक चरण बाकी हैं। विधायी प्रक्रिया, संसदीय समिति की सिफारिशें, राज्यों की सहमति और संभावित संवैधानिक संशोधन इसकी वास्तविक समयसीमा तय करने में महत्वपूर्ण होंगे।
इसलिए फिलहाल 2029 के साथ 22 राज्यों/UTs के चुनाव कराने की चर्चा को विचाराधीन राजनीतिक रोडमैप के रूप में देखना अधिक सटीक है, न कि घोषित चुनाव कार्यक्रम के रूप में।
संतुलित विश्लेषण: बड़ा चुनाव सुधार या संघीय व्यवस्था के लिए चुनौती?
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ भारत की चुनाव व्यवस्था में दशकों के सबसे बड़े संरचनात्मक बदलावों में से एक हो सकता है।
समर्थकों के लिए इसका आकर्षण स्पष्ट है—कम चुनावी व्यवधान, संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल और सरकारों को नीति लागू करने के लिए लंबा निर्बाध समय।
लेकिन आलोचकों के सवाल भी महत्वपूर्ण हैं। भारत एक विशाल संघीय लोकतंत्र है जहां राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियां अलग-अलग होती हैं। विधानसभा का कार्यकाल छोटा या लंबा करके चुनावों को एक समय पर लाना संवैधानिक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील विषय बन सकता है।
2029 का प्रस्ताव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बहस अब केवल इस सवाल तक सीमित नहीं रह गई है कि ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ होना चाहिए या नहीं। चर्चा धीरे-धीरे इस ओर बढ़ रही है कि यदि इसे लागू किया जाए तो व्यावहारिक रूप से इसकी शुरुआत कैसे और कब हो सकती है।
