'वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण पर Congress और National Conference आमने-सामने, सहयोगी दलों में बढ़ा मतभेद
Introduction
जम्मू-कश्मीर की राजनीति में कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच एक राष्ट्रीय प्रतीक को लेकर महत्वपूर्ण वैचारिक मतभेद सामने आया है।
श्रीनगर में International Film Festival of Jammu and Kashmir के उद्घाटन समारोह में ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह पद बजाए गए। मुख्यमंत्री Omar Abdullah और National Conference के अध्यक्ष Farooq Abdullah पूरे संस्करण के दौरान खड़े रहे।
इसके बाद कांग्रेस महासचिव (संगठन) K C Venugopal ने सार्वजनिक रूप से आपत्ति जताई। कांग्रेस का तर्क है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान विकसित ऐतिहासिक सहमति के अनुरूप सार्वजनिक और पार्टी कार्यक्रमों में पहले दो पदों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
National Conference ने इसका जवाब देते हुए साफ किया कि कांग्रेस अपने गठबंधन सहयोगियों को इस मुद्दे पर निर्देश नहीं दे सकती।
श्रीनगर के Film Festival से शुरू हुआ विवाद
विवाद International Film Festival of Jammu and Kashmir के उद्घाटन समारोह के बाद तेज हुआ।
कार्यक्रम में ‘वंदे मातरम्’ का पूर्ण छह-पद वाला संस्करण बजाया गया। Omar Abdullah और Farooq Abdullah सहित वहां मौजूद NC नेता पूरे संस्करण के दौरान सम्मान में खड़े रहे।
कांग्रेस ने इसी घटनाक्रम पर सवाल उठाया।
K C Venugopal ने कार्यक्रम का वीडियो साझा करते हुए कांग्रेस के ऐतिहासिक रुख का उल्लेख किया और गठबंधन सहयोगियों से भी उस फैसले की भावना का सम्मान करने की अपेक्षा जताई।
कांग्रेस पहले दो पदों पर क्यों दे रही जोर?
कांग्रेस अपने रुख के समर्थन में 1937 के Congress Working Committee के फैसले का उल्लेख कर रही है।
उस समय पार्टी नेतृत्व ने ‘वंदे मातरम्’ के पहले दो पदों को सार्वजनिक कार्यक्रमों में इस्तेमाल करने का निर्णय लिया था। कांग्रेस का मौजूदा तर्क है कि यह फैसला भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को ध्यान में रखते हुए स्वतंत्रता आंदोलन के वरिष्ठ नेताओं के विचार-विमर्श के बाद लिया गया था।
K C Venugopal ने Mahatma Gandhi, Jawaharlal Nehru, Sardar Vallabhbhai Patel, Subhas Chandra Bose, Rajendra Prasad, Maulana Azad और Sarojini Naidu सहित स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं के निर्णय और दृष्टिकोण का सम्मान करने की बात कही।
Jammu and Kashmir Congress अध्यक्ष Tariq Hameed Karra ने भी National Conference के रुख पर चिंता जताई।
Karra के अनुसार, राष्ट्रीय प्रतीकों की शक्ति देश की विविधता को एक साथ जोड़ने में है और इस विषय को स्वतंत्रता आंदोलन के साथ भारत की बाद की संवैधानिक यात्रा के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए।
National Conference ने दिया जवाब
National Conference ने कांग्रेस की आपत्ति को स्वीकार नहीं किया।
NC के मुख्य प्रवक्ता और विधायक Tanvir Sadiq ने पार्टी का पक्ष रखते हुए कहा कि आधिकारिक राज्य कार्यक्रमों में पूर्ण संस्करण बजाना एक “statutory obligation” है।
साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को पूरा गीत गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा रहा।
NC ने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए अन्य गैर-BJP शासित राज्यों का भी उदाहरण दिया। Tanvir Sadiq ने Telangana और Karnataka में कांग्रेस नेताओं द्वारा पूर्ण संस्करण के दौरान मौजूद रहने से संबंधित वीडियो साझा कर कांग्रेस से अपने रुख में समानता रखने का सवाल किया।
कांग्रेस शासित राज्यों का उदाहरण देकर NC का पलटवार
यह जवाब इस राजनीतिक विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
National Conference का सवाल मूलतः यह है कि यदि कांग्रेस पूर्ण संस्करण का विरोध सिद्धांत के आधार पर करती है, तो वही मानक कांग्रेस शासित राज्यों और उसके नेताओं पर भी लागू होना चाहिए।
Tanvir Sadiq ने Telangana के मुख्यमंत्री A Revanth Reddy और Karnataka के उपमुख्यमंत्री D K Shivakumar से जुड़े वीडियो का हवाला देते हुए कांग्रेस नेतृत्व के सामने यही सवाल रखा।
इससे विवाद केवल जम्मू-कश्मीर तक सीमित न रहकर कांग्रेस की राष्ट्रीय स्तर की नीति और उसके व्यवहार के बीच संभावित अंतर पर भी केंद्रित हो गया है।
गठबंधन में राजनीतिक असहमति क्यों महत्वपूर्ण?
Congress और National Conference केवल दो अलग-अलग राजनीतिक दल नहीं हैं। दोनों INDIA गठबंधन का हिस्सा हैं और जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक सहयोग भी रखते हैं।
इसी वजह से ‘वंदे मातरम्’ पर सार्वजनिक बयानबाजी को सामान्य विपक्ष-सत्तापक्ष विवाद से अलग देखा जा रहा है।
हालांकि, इस मतभेद को फिलहाल गठबंधन टूटने या औपचारिक राजनीतिक अलगाव के रूप में पेश करना सही नहीं होगा। उपलब्ध जानकारी केवल यह दिखाती है कि दोनों सहयोगी दलों ने इस विशेष मुद्दे पर अलग-अलग सार्वजनिक रुख अपनाया है।
इस विवाद के पीछे दोनों दलों के बीच अन्य राजनीतिक मतभेद भी मौजूद हैं, लेकिन ‘वंदे मातरम्’ प्रकरण को उन सभी मुद्दों का प्रत्यक्ष परिणाम मानने के लिए पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
1937 का फैसला क्यों बार-बार चर्चा में आ रहा है?
मौजूदा बहस को समझने के लिए इसका ऐतिहासिक संदर्भ महत्वपूर्ण है।
‘वंदे मातरम्’ Bankim Chandra Chattopadhyay की रचना है और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में इसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1937 में Congress Working Committee ने इसके पहले दो पदों के सार्वजनिक इस्तेमाल को लेकर निर्णय किया था। कांग्रेस आज उसी ऐतिहासिक फैसले को अपने वर्तमान रुख का आधार बता रही है।
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अंतिम सत्र में राष्ट्रपति Rajendra Prasad ने कहा था कि ‘वंदे मातरम्’, जिसने स्वतंत्रता संघर्ष में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, को ‘जन गण मन’ के समान सम्मान दिया जाएगा।
मौजूदा राजनीतिक विवाद गीत के सम्मान को लेकर नहीं, बल्कि सार्वजनिक और आधिकारिक कार्यक्रमों में इसके किस संस्करण को प्रस्तुत किया जाए, इस प्रश्न पर केंद्रित है।
विवाद दूसरे सरकारी कार्यक्रम तक पहुंचा
यह मामला केवल Film Festival तक सीमित नहीं रहा।
रिपोर्टों के अनुसार, इसके बाद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट के Chief Justice के शपथ ग्रहण समारोह में भी ‘वंदे मातरम्’ का पूर्ण संस्करण बजाया गया और Omar Abdullah पूरे समय सम्मान में खड़े रहे।
इससे यह संकेत मिला कि National Conference अपनी घोषित स्थिति से पीछे हटने के मूड में नहीं है।
दूसरी ओर, कांग्रेस नेतृत्व ने भी पहले दो पदों को लेकर अपने ऐतिहासिक रुख का सार्वजनिक रूप से बचाव जारी रखा है।
मुद्दा सम्मान का नहीं, संस्करण का
इस पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण अंतर बनाए रखना जरूरी है।
उपलब्ध बयानों के आधार पर कांग्रेस ने ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में मिले सम्मान को चुनौती नहीं दी है। उसकी आपत्ति पूर्ण छह-पद वाले संस्करण के आधिकारिक इस्तेमाल को लेकर है।
वहीं National Conference का कहना है कि सरकारी कार्यक्रमों में पूर्ण संस्करण बजाना उचित और आवश्यक है तथा ऐसा करना राष्ट्रीय गीत के प्रति सम्मान का हिस्सा है।
इसलिए विवाद को सीधे ‘वंदे मातरम् के समर्थन बनाम विरोध’ के रूप में पेश करना दोनों पक्षों की वास्तविक स्थिति को जरूरत से ज्यादा सरल बना देगा।
फिलहाल यह पूर्ण छह-पद वाले संस्करण बनाम ऐतिहासिक रूप से स्वीकृत पहले दो पदों के इस्तेमाल को लेकर राजनीतिक और वैचारिक मतभेद है।
