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राजनीति

वोटर लिस्ट पर नई बहस: SIR के आंकड़ों से लेकर नाम बहाली तक क्यों उठ रहे सवाल?

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर बहस अब आंकड़ों, सत्यापन और मतदाताओं के अधिकारों पर केंद्रित हो गई है। छह राज्यों में करीब 1,600 संदिग्ध विदेशी नागरिकों की पहचान की रिपोर्ट सामने आने के बाद प्रक्रिया के उद्देश्यों पर सवाल उठे हैं। दूसरी ओर, दिल्ली में पहले से पंजीकृत मतदाताओं के नाम बहाल करने की व्यवस्था पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। विवाद का मुख्य प्रश्न है: सूची को त्रुटिरहित बनाते समय पात्र नागरिकों का नाम छूटने से कैसे रोका जाए?

वोटर लिस्ट पर नई बहस: SIR के आंकड़ों से लेकर नाम बहाली तक क्यों उठ रहे सवाल?
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द्वारा साधना गुप्ता

स्रोत: Press Information Bureau, Hindustan, thenewsmill, moneycontrol, livelaw,

क्या है विशेष गहन पुनरीक्षण?

SIR मतदाता सूची की व्यापक जांच और अद्यतन करने की प्रक्रिया है। चुनाव आयोग ने 24 जून 2025 को बिहार में इसे शुरू करते समय बताया था कि उद्देश्य सभी पात्र नागरिकों का नाम शामिल करना, अपात्र प्रविष्टियां हटाना और नाम जोड़ने या हटाने में पारदर्शिता सुनिश्चित करना है।

आयोग ने इसकी जरूरत के पीछे शहरीकरण, लोगों का बार-बार स्थान बदलना, नए युवाओं का मतदान योग्य होना, मृत्यु की सूचना दर्ज नहीं होना और अवैध विदेशी प्रवासियों के नाम शामिल होने जैसी वजहें गिनाई थीं। इसलिए विदेशी नागरिकों की पहचान इस अभियान का एक हिस्सा है, पूरा उद्देश्य नहीं।

छह राज्यों के आंकड़ों ने क्यों खींचा ध्यान?

हिन्दुस्तान टाइम्स की पड़ताल पर आधारित हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, छह राज्यों में लगभग 1,600 संदिग्ध विदेशी नागरिकों के मामले सामने आए। इनमें कर्नाटक में 716, केरल में करीब 500, गोवा में 419, झारखंड में तीन और मेघालय में दो मामले बताए गए। मिजोरम में ऐसा कोई मामला दर्ज होने की जानकारी नहीं मिली।

इन संख्याओं को समझते समय उनकी प्रकृति पर ध्यान देना जरूरी है। कहीं विदेशी नागरिकता रखने वाले लोगों का उल्लेख है, तो कहीं संदिग्ध विदेशी पासपोर्टधारकों का। सभी मामलों को समान रूप से अंतिम नागरिकता निर्धारण या अवैध घुसपैठ का प्रमाण बताना उपलब्ध जानकारी से आगे का निष्कर्ष होगा।

उपलब्ध डेटा पूरे देश की तस्वीर नहीं

उसी रिपोर्ट के मुताबिक, 26 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के निर्वाचन अधिकारियों से जानकारी मांगी गई थी। इनमें 11 ने जवाब दिया और छह ने संख्या उपलब्ध कराई। पंजाब, दिल्ली, उत्तराखंड तथा तेलंगाना के अधिकारियों ने अलग रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने की बात कही।

चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से रिपोर्ट बताती है कि राज्यों से ऐसे मामलों का अलग आंकड़ा जुटाने को नहीं कहा गया था। इसलिए लगभग 1,600 की संख्या को पूरे भारत का अंतिम आंकड़ा मानना गलत होगा। इससे राज्यों के बीच रिकॉर्ड रखने के तरीकों में अंतर जरूर सामने आता है।

कांग्रेस ने उठाए सवाल, आरोप और तथ्य अलग

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इन आंकड़ों के आधार पर SIR की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए। उन्होंने करीब दस करोड़ लोगों से जुड़ी प्रक्रिया में इतनी कम संख्या सामने आने का मुद्दा उठाया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग दोहराई।

हालांकि, राजनीतिक आलोचना और प्रमाणित निष्कर्ष अलग हैं। विदेशी नागरिकों के कम मामले मिलने से अपने आप यह साबित नहीं होता कि पूरी प्रक्रिया अनुचित थी। इसी तरह सूची से हटाया गया प्रत्येक नाम अपात्र व्यक्ति का था, यह भी बिना अलग-अलग मामलों की जांच के नहीं कहा जा सकता।

दिल्ली में पुराने मतदाताओं से नया आवेदन क्यों?

28 अक्टूबर की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की मसौदा सूची से बाहर हुए पहले से पंजीकृत मतदाताओं के लिए फॉर्म 6 की आवश्यकता पर सवाल उठाए। अदालत के सामने मुद्दा था कि पता बदलने या सत्यापन के दौरान नहीं मिलने वाले व्यक्ति को नए पंजीकरण जैसी घोषणा क्यों करनी चाहिए।

सुनवाई की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने पता बदलने वाले मतदाताओं के लिए फॉर्म 8 तथा गणना फॉर्म के माध्यम से समाधान की संभावनाओं पर विचार करने को कहा। उसने अस्थायी अनुपस्थिति और स्थायी रूप से स्थान बदलने में अंतर करने पर भी जोर दिया। रोजी-रोटी के लिए कुछ समय बाहर रहने वाले व्यक्ति की स्थिति को सावधानी से जांचना इस बहस का महत्वपूर्ण पहलू है।

‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ पर फैसला अभी बाकी

मतदाता रिकॉर्ड में कथित असंगतियों को चिह्नित करने वाली ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ श्रेणी भी न्यायिक जांच के दायरे में है। लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसकी वैधता पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। पश्चिम बंगाल में इसके इस्तेमाल की अनुमति अंतरिम व्यवस्था थी।

अदालत ने पहले की सूची में शामिल मतदाताओं की प्रविष्टियों को व्यापक पैमाने पर दोबारा जांचने के आधार पर प्रश्न उठाए। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि अदालत ने इस श्रेणी को पूरी तरह मंजूरी दे दी है या अंतिम रूप से अवैध घोषित कर दिया है।

आगे भरोसा कैसे मजबूत होगा?

चुनाव आयोग के वकील ने अदालत में शिविरों, घर-घर संपर्क और बूथ स्तर अधिकारियों की तैनाती का उल्लेख किया। अदालत ने प्रभावित मतदाताओं तक सक्रिय रूप से पहुंचने और समयसीमा पर जरूरत के अनुसार विचार करने को कहा। इसे समयसीमा स्वतः बढ़ जाने की घोषणा नहीं समझना चाहिए।

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