यूरोप के पांच देशों में विरोध की लहर
पेरिस/ब्रसेल्स, 19 अक्टूबर 2026: यूरोप के कई देशों में युवाओं का असंतोष अब सड़कों पर दिखाई देने लगा है। फ्रांस से लेकर पुर्तगाल, इटली, बेल्जियम और अल्बानिया तक हजारों लोग सरकारों की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। कहीं विश्वविद्यालयों की स्थिति पर सवाल उठ रहे हैं, तो कहीं बढ़ते मकान किराए, कम वेतन और रोजगार की अनिश्चितता ने लोगों की नाराजगी बढ़ा दी है।
17 और 18 अक्टूबर को इन प्रदर्शनों ने कई जगह हिंसक रूप भी लिया। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं, सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचा और बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया। हालांकि यह सभी देशों में एक जैसा आंदोलन नहीं है, लेकिन एक बात स्पष्ट दिखाई देती है—युवा पीढ़ी अपने भविष्य को लेकर बढ़ती असुरक्षा से परेशान है।
फ्रांस: शिक्षा से शुरू हुआ आंदोलन, महंगाई के खिलाफ देशव्यापी विरोध
फ्रांस इस विरोध की सबसे बड़ी तस्वीर बनकर उभरा है। सितंबर में पेरिस के आसपास स्कूली छात्रों ने शिक्षकों की कमी, खस्ताहाल स्कूल भवनों, भीड़भाड़ वाली कक्षाओं और शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं को लेकर आवाज उठाई थी।
धीरे-धीरे इस आंदोलन में शिक्षक, कर्मचारी संगठन और महंगाई से परेशान नागरिक भी शामिल होने लगे।
17 अक्टूबर को फ्रांस के गृह मंत्रालय के अनुसार, देशभर में 5.5 लाख से अधिक लोग प्रदर्शन में शामिल हुए। कई शहरों में हिंसक समूहों ने दुकानों में तोड़फोड़ की और वाहनों को आग लगा दी। लिमोज शहर का ऐतिहासिक टाउन हॉल भी आग की चपेट में आ गया। रॉयटर्स के अनुसार, सप्ताहांत की हिंसा के बाद 2,400 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया और एक प्रदर्शनकारी की मौत की खबर सामने आई।
राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हिंसा की निंदा करते हुए छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारी संगठनों के साथ बातचीत कर समाधान तलाशने की बात कही है।
पुर्तगाल: घर खरीदना तो दूर, किराया चुकाना भी मुश्किल
पुर्तगाल में विरोध की सबसे बड़ी वजह आवास संकट है। राजधानी लिस्बन में 17 अक्टूबर को हजारों लोग सड़कों पर उतरे। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वेतन के मुकाबले मकानों की कीमतें और किराए तेजी से बढ़ रहे हैं। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पुर्तगाल में 2017 के बाद से मकानों की कीमतें दोगुनी से अधिक हो चुकी हैं। नए किराया समझौतों की दरों में भी लगभग इतनी ही वृद्धि हुई है।
देश के प्रमुख श्रमिक संगठन CGTP ने बेहतर वेतन और सार्वजनिक सेवाओं की मांग को लेकर प्रदर्शन आयोजित किया। वहीं आवास अधिकार कार्यकर्ताओं ने लिस्बन के रोसियो चौक पर तंबू लगाकर विरोध जताया। यह आंदोलन केवल छात्रों तक सीमित नहीं है। इसमें नौकरीपेशा लोगों और विभिन्न आयु वर्ग के नागरिकों की भी भागीदारी है।
इटली: मिलान की सड़कों पर झड़पें, मेलोनी सरकार की बढ़ी चुनौती
इटली में महंगाई, सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति और युद्ध-विरोधी मांगों को लेकर प्रदर्शन हुए।
17 अक्टूबर को मिलान में शुरू हुआ एक शांतिपूर्ण मार्च बाद में हिंसक झड़पों में बदल गया। कुछ नकाबपोश लोगों ने पुलिस पर पत्थर फेंके, दुकानों में तोड़फोड़ की और अवरोधकों में आग लगा दी। 18 अक्टूबर को भी मिलान में तनाव बना रहा। रॉयटर्स के मुताबिक, पुलिस 60 से अधिक लोगों को जांच के लिए थाने ले गई। प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने कहा कि विरोध प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन हिंसा और शहरों को नुकसान पहुंचाना स्वीकार नहीं किया जा सकता। प्रदर्शन बोलोन्या और अन्य इतालवी शहरों में भी देखने को मिले।
बेल्जियम: शिक्षा सुधारों और बजट कटौती पर छात्रों का विरोध
बेल्जियम में खासकर ब्रसेल्स और लीज शहर में छात्रों ने शिक्षा की बढ़ती लागत और सरकारी सुधारों के खिलाफ प्रदर्शन किए।
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि प्रस्तावित बदलावों से उच्च शिक्षा तक पहुंच कठिन हो सकती है। कई विद्यार्थियों ने अध्ययन सामग्री की लागत और शिक्षा सुविधाओं को लेकर चिंता जताई। 17 अक्टूबर को ब्रसेल्स में प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों की पुलिस से झड़प हुई। पुलिस ने आंसू गैस और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया। बेल्जियम के गृह मंत्री बर्नार्ड क्विंटिन ने हिंसा की निंदा की। हालांकि शिक्षा संबंधी मांगों और हिंसक घटनाओं को अलग-अलग समझना जरूरी है।
अल्बानिया: बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार से इस्तीफे की मांग
अल्बानिया में छात्रों की नाराजगी शिक्षा व्यवस्था से आगे बढ़कर प्रधानमंत्री एडी रामा की सरकार के खिलाफ व्यापक विरोध में बदल गई है। 13 अक्टूबर को राजधानी तिराना में विद्यार्थियों ने विश्वविद्यालयों की खराब स्थिति, पढ़ाई की बढ़ती लागत, वित्तीय सहायता की कमी और रोजगार की सीमित संभावनाओं के खिलाफ प्रदर्शन किया। इसके बाद कई स्थानों पर हिंसक घटनाएं हुईं। पुलिस ने आंसू गैस और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। प्रदर्शनकारियों के एक हिस्से ने सरकारी इमारतों को निशाना बनाया।
भ्रष्टाचार के आरोप और विवादास्पद विकास परियोजनाएं भी इस असंतोष का हिस्सा हैं। प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं, जबकि रामा ने पद छोड़ने से इनकार किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि हिंसक प्रदर्शन देश की यूरोपीय संघ में शामिल होने की महत्वाकांक्षा को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
क्या यह यूरोप में Gen Z की नई राजनीतिक ताकत का संकेत है?
इन प्रदर्शनों में युवाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन सभी आंदोलनों को केवल Gen Z का विद्रोह कहना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। फ्रांस में स्कूलों की समस्याएं बड़ा मुद्दा हैं, पुर्तगाल में घर और वेतन की चिंता है, जबकि अल्बानिया में भ्रष्टाचार तथा रोजगार के अवसर प्रमुख सवाल बन गए हैं। इन विरोध प्रदर्शनों के पीछे अलग-अलग स्थानीय कारण और संगठन हैं। फिर भी एक साझा चिंता सामने आती है—क्या नई पीढ़ी को बेहतर शिक्षा, सम्मानजनक रोजगार और किफायती जीवन मिल पाएगा?
सरकारों के सामने अब क्या चुनौती?
यूरोप की सरकारों के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर उन्हें हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करनी है, दूसरी ओर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की वास्तविक मांगों पर भी जवाब देना होगा। युवाओं की नाराजगी केवल तत्काल आर्थिक राहत की मांग नहीं है। यह उस भरोसे से भी जुड़ी है कि मेहनत और शिक्षा के सहारे उनका भविष्य बेहतर हो सकता है। आने वाले दिनों में सरकारों की बातचीत और नीतिगत फैसले तय करेंगे कि यह असंतोष कम होगा या विरोध प्रदर्शन और व्यापक रूप लेंगे।
