फाइनल में 6-0 से पिछड़ने के बाद मनीषा ने की शानदार वापसी
अमेरिका की एबिगेल नेटे के खिलाफ फाइनल मुकाबले की शुरुआत मनीषा के लिए आसान नहीं रही। नेटे ने शुरुआती दौर में आक्रामक खेल दिखाया और लगातार अंक हासिल करते हुए बढ़त बना ली। एक समय स्कोर 6-0 हो गया था और ऐसा लग रहा था कि मुकाबला अमेरिकी पहलवान के पक्ष में जा सकता है।
लेकिन मनीषा ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी रणनीति में बदलाव किया और विरोधी पहलवान को संभलने का मौका नहीं दिया। पहले उन्होंने एक अंक हासिल करके वापसी की शुरुआत की। इसके बाद टेकडाउन और गट-व्रेंच तकनीक की मदद से लगातार अंक जुटाए।
मुकाबले में स्कोर 6-6 होने के बाद दोनों खिलाड़ियों के बीच संघर्ष और तेज हो गया। नेटे अपनी बढ़त वापस हासिल करने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन मनीषा ने दबाव के बीच एक और अहम टेकडाउन किया और 8-6 की बढ़त बना ली। आखिरी समय तक उन्होंने इस बढ़त को कायम रखा और गोल्ड मेडल अपने नाम कर लिया।
यूनाइटेड वर्ल्ड रेसलिंग (UWW) की रिपोर्ट के मुताबिक, मनीषा ने 6-0 से पिछड़ने के बाद वापसी करते हुए यह ऐतिहासिक जीत दर्ज की। उनका प्रदर्शन दिखाता है कि कुश्ती में तकनीक के साथ-साथ मानसिक मजबूती और सही समय पर रणनीति बदलना कितना महत्वपूर्ण होता है।
भारत की पहली महिला सीनियर वर्ल्ड चैंपियन बनीं मनीषा
मनीषा भंवाला की इस उपलब्धि ने भारतीय महिला कुश्ती के सामने एक नया मुकाम स्थापित किया है। इससे पहले भारतीय महिला पहलवान वर्ल्ड चैंपियनशिप में सिल्वर और ब्रॉन्ज मेडल जीत चुकी थीं, लेकिन सीनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में गोल्ड का इंतजार बरकरार था।
साल 2021 में अंशु मलिक ने 57 किलोग्राम कैटेगरी में सिल्वर मेडल जीतकर इतिहास बनाया था। वहीं, 2026 के इस टूर्नामेंट में नीलम सिरोही और काजल धोचक ने भी फाइनल तक पहुंचकर सिल्वर मेडल हासिल किए। लेकिन गोल्ड मेडल तक पहुंचने का सपना मनीषा ने पूरा किया।
इस जीत के साथ मनीषा सीनियर वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप में गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय महिला बन गई हैं। वह पुरुष पहलवान सुशील कुमार के बाद सीनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में गोल्ड जीतने वाली दूसरी भारतीय पहलवान भी हैं। सुशील कुमार ने साल 2010 में पुरुषों की 66 किलोग्राम फ्रीस्टाइल कैटेगरी में विश्व खिताब जीता था। इस तरह करीब 16 साल बाद भारत को सीनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में एक और गोल्ड मेडल मिला है।
मनीषा के अलावा इन भारतीय पहलवानों ने भी जीते मेडल
अस्ताना में आयोजित वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप में भारतीय महिला पहलवानों ने शानदार प्रदर्शन किया। मनीषा के गोल्ड के अलावा भारत ने दो सिल्वर और एक ब्रॉन्ज मेडल भी हासिल किया।
काजल धोचक ने 76 किलोग्राम कैटेगरी में सिल्वर मेडल जीता, जबकि नीलम सिरोही ने 50 किलोग्राम कैटेगरी में दूसरा स्थान हासिल किया। वहीं, तनु शर्मा ने 72 किलोग्राम कैटेगरी में ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया।
इस तरह भारतीय महिला टीम ने प्रतियोगिता में कुल चार मेडल जीते। यह महिला कुश्ती के लिए वर्ल्ड चैंपियनशिप में भारत का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा। इससे पहले 2021 में भारत ने महिला वर्ग में एक सिल्वर और एक ब्रॉन्ज मेडल जीता था।
खास बात यह रही कि इस बार भारतीय महिला पहलवानों ने तीन फाइनल मुकाबलों में जगह बनाई और चार मेडल जीतकर प्रतियोगिता का समापन किया। यह प्रदर्शन भारतीय कुश्ती में उभरती नई प्रतिभाओं और बेहतर तैयारी का संकेत देता है।
पिता का सपना पूरा करने के लिए जारी रखा संघर्ष
मनीषा की सफलता के पीछे लंबे समय का संघर्ष और व्यक्तिगत चुनौतियां भी रही हैं। आउटलुक इंडिया को दिए इंटरव्यू में उन्होंने अपने पिता सुरेश भंवाला के बारे में बताया था। साल 2022 में उनके पिता का निधन हो गया था। वह उनकी कुश्ती यात्रा में बड़ा सहारा थे और बेटी को आगे बढ़ते देखना चाहते थे।
पिता के निधन के बाद मनीषा के लिए खेल में बने रहना आसान नहीं था। उन्होंने एक समय कुश्ती छोड़ने के बारे में भी सोचा, लेकिन परिवार के सहयोग और पिता के सपने ने उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। मनीषा ने बताया था कि पिता के जाने के बाद उनके लिए कुश्ती का मकसद और भी बड़ा हो गया था।
वर्ल्ड चैंपियनशिप का गोल्ड उनके वर्षों के अभ्यास, मेहनत और मुश्किल समय में हार न मानने का परिणाम है। इससे पहले वह सीनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में हिस्सा ले चुकी थीं, लेकिन पदक जीतने में सफल नहीं हुई थीं। इस बार उन्होंने अपने पुराने अनुभवों से सीखते हुए सबसे बड़े मंच पर शानदार प्रदर्शन किया।
भारतीय महिला कुश्ती के लिए नई उम्मीद
मनीषा भंवाला का गोल्ड मेडल सिर्फ एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि भारतीय महिला कुश्ती के लिए नई संभावनाओं का रास्ता भी खोलता है। काजल, नीलम और तनु जैसी पहलवानों के प्रदर्शन ने यह दिखाया है कि भारत के पास अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला करने वाली प्रतिभाओं की मजबूत टीम तैयार हो रही है।
इस उपलब्धि से आने वाली पीढ़ी की महिला पहलवानों को भी प्रेरणा मिलेगी। मनीषा ने साबित किया है कि बड़े मुकाबलों में शुरुआती पिछड़ना अंतिम नतीजा तय नहीं करता। आत्मविश्वास, मेहनत और सही रणनीति के दम पर मुश्किल से मुश्किल मुकाबला भी जीता जा सकता है।
अस्ताना में तिरंगा ऊंचा करने वाली मनीषा भंवाला की यह जीत भारतीय खेल इतिहास का यादगार अध्याय बन गई है। अब देश को उम्मीद होगी कि उनकी यह सफलता महिला कुश्ती में नए विश्व खिताबों की शुरुआत साबित होगी।
