भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत आने वाले टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट बोर्ड (TDB) ने 26 अक्टूबर 2026 को Manastu Space के साथ यह समझौता किया। यह वित्तीय सहायता सरकार के रिसर्च, डेवलपमेंट एंड इनोवेशन (RDI) फंड के तहत दी जाएगी। खास बात यह है कि कंपनी का पूरा प्रोजेक्ट ₹277.63 करोड़ का है, जिसमें सरकार की ओर से ₹116 करोड़ का सहयोग प्रस्तावित है। यह सहायता सीधे अनुदान (Grant) के रूप में नहीं, बल्कि ऑप्शनली कन्वर्टिबल डेट (Optionally Convertible Debt) के माध्यम से दी जाएगी।
1. क्या है Manastu Space की ग्रीन प्रोपल्शन तकनीक?
अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले सैटेलाइट को केवल पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करना ही पर्याप्त नहीं होता। उन्हें अपनी दिशा बदलने, कक्षा को नियंत्रित करने, एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने और मिशन के दौरान जरूरी गतिविधियां पूरी करने के लिए प्रोपल्शन सिस्टम की जरूरत होती है।
आमतौर पर सैटेलाइट में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक प्रोपल्शन सिस्टम में हाइड्राजीन जैसे रासायनिक ईंधन का उपयोग किया जाता है। हालांकि, ऐसे ईंधनों के रखरखाव, भंडारण और इस्तेमाल के दौरान सुरक्षा से जुड़ी कई चुनौतियां होती हैं।
इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए Manastu Space हाइड्रोजन पेरॉक्साइड आधारित ग्रीन प्रोपेलेंट विकसित कर रही है। इसमें विशेष एडिटिव्स का इस्तेमाल किया जाता है और इसके साथ एक इंटीग्रेटेड इंजन तथा कैटेलिस्ट सिस्टम काम करता है।
कंपनी की MS-289 तकनीक का उद्देश्य पारंपरिक जहरीले प्रोपेलेंट के मुकाबले अधिक सुरक्षित, किफायती और बेहतर प्रदर्शन वाला विकल्प उपलब्ध कराना है। इस तकनीक में कैटेलिस्ट रासायनिक प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने में मदद करता है, जिससे जरूरी थ्रस्ट यानी आगे बढ़ने वाली ताकत पैदा होती है।
इसका फायदा यह हो सकता है कि भविष्य में सैटेलाइट के लिए ईंधन का इस्तेमाल, रखरखाव और मिशन संचालन पहले की तुलना में अधिक सुविधाजनक बनाया जा सके।
2. छोटे सैटेलाइट से बड़े स्पेस मिशन तक होगी तकनीक की पहुंच
Manastu Space का यह प्रोजेक्ट केवल छोटे सैटेलाइट तक सीमित नहीं है। कंपनी एक ऐसा स्केलेबल प्रोपल्शन सिस्टम विकसित करना चाहती है, जिसका इस्तेमाल अलग-अलग आकार और क्षमता वाले अंतरिक्ष यानों में किया जा सके।
सरकारी समझौते के अनुसार, इस प्रोजेक्ट के तहत 5 मिली न्यूटन (mN) से लेकर 300 न्यूटन (N) तक के थ्रस्ट वाले प्रोपल्शन सिस्टम विकसित किए जाएंगे।
इसका मतलब है कि तकनीक का इस्तेमाल छोटे सैटेलाइट से लेकर अधिक थ्रस्ट की जरूरत वाले बड़े अंतरिक्ष अनुप्रयोगों तक किया जा सकता है। प्रोजेक्ट में प्रोपल्शन इंजन, प्रोपेलेंट फीड सिस्टम और अल्ट्रा-हाई-टेम्परेचर सिरेमिक कैटेलिस्ट के विकास पर भी काम होगा।
यह तकनीक भारत के निजी स्पेस सेक्टर के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है, क्योंकि सैटेलाइट निर्माण के साथ-साथ उनके संचालन और नियंत्रण के लिए भी स्वदेशी तकनीक की जरूरत लगातार बढ़ रही है।
3. अंतरिक्ष में पहले ही हो चुका है तकनीक का परीक्षण
Manastu Space की तकनीक की खास बात यह है कि यह अभी केवल लैब या रिसर्च तक सीमित नहीं है। कंपनी अपने ग्रीन प्रोपल्शन सिस्टम का अंतरिक्ष में परीक्षण भी कर चुकी है।
दिसंबर 2024 में ISRO के PSLV-C60 मिशन के साथ जुड़े POEM-4 प्लेटफॉर्म पर कंपनी के Vyom 2U थ्रस्टर का परीक्षण किया गया था। इस परीक्षण के दौरान कंपनी के प्रोपल्शन सिस्टम ने प्लेटफॉर्म की दिशा बदलने में मदद की थी।
यह परीक्षण इसलिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि इससे यह साबित करने की दिशा में प्रगति हुई कि कंपनी की स्वदेशी तकनीक वास्तविक अंतरिक्ष परिस्थितियों में काम कर सकती है।
हालांकि, किसी तकनीक का अंतरिक्ष में सफल प्रदर्शन और उसका बड़े स्तर पर व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए पूरी तरह तैयार होना दो अलग-अलग चरण हैं। इसी अंतर को पूरा करने के लिए अब सरकार की ओर से वित्तीय सहायता दी जा रही है।
4. TRL-6 से TRL-9 तक पहुंचने का लक्ष्य
इस प्रोजेक्ट का एक बड़ा उद्देश्य कंपनी की तकनीक को Technology Readiness Level (TRL)-6 से TRL-9 तक पहुंचाना है।
आसान भाषा में समझें तो TRL एक ऐसा पैमाना है, जिससे पता चलता है कि कोई नई तकनीक शुरुआती रिसर्च से लेकर वास्तविक इस्तेमाल के लिए कितनी तैयार हो चुकी है।
TRL-6: तकनीक का संबंधित परिस्थितियों में प्रोटोटाइप के रूप में प्रदर्शन किया जा चुका होता है।
TRL-7: तकनीक को वास्तविक परिचालन परिस्थितियों के करीब या उनमें प्रदर्शित किया जाता है।
TRL-8: तकनीक का सिस्टम पूरी तरह विकसित और क्वालिफिकेशन के लिए तैयार होता है।
TRL-9: तकनीक वास्तविक परिचालन परिस्थितियों में सफलतापूर्वक काम कर चुकी होती है।
Manastu Space का लक्ष्य अपनी तकनीक की इंजीनियरिंग, सिस्टम इंटीग्रेशन, टेस्टिंग और वैलिडेशन को आगे बढ़ाना है। इससे प्रोपल्शन सिस्टम की विश्वसनीयता और प्रदर्शन को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।
इसका अर्थ यह नहीं है कि कंपनी की पूरी तकनीक अभी TRL-9 पर पहुंच चुकी है, बल्कि सरकारी सहायता के तहत उसे इस स्तर तक पहुंचाने की योजना है।
5. भारत के स्पेस स्टार्टअप सेक्टर के लिए क्यों अहम है यह निवेश?
पिछले कुछ वर्षों में भारत का निजी अंतरिक्ष उद्योग तेजी से आगे बढ़ा है। अब स्पेस सेक्टर केवल ISRO और सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं है। निजी कंपनियां भी रॉकेट, सैटेलाइट, स्पेस सॉफ्टवेयर और प्रोपल्शन सिस्टम जैसी तकनीकों पर काम कर रही हैं।
लेकिन किसी नई अंतरिक्ष तकनीक को विकसित करने के लिए केवल शुरुआती निवेश पर्याप्त नहीं होता। उसके परीक्षण, सुरक्षा मानकों, इंजीनियरिंग और व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए बड़ी पूंजी की जरूरत पड़ती है।
ऐसे में सरकार का RDI फंड डीप टेक कंपनियों को लंबी अवधि के अनुसंधान और विकास के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने की दिशा में काम करता है।
Manastu Space को मिलने वाला ₹116 करोड़ का समर्थन इसी रणनीति का हिस्सा है। इससे भारत में सैटेलाइट प्रोपल्शन जैसी महत्वपूर्ण तकनीक का घरेलू स्तर पर विकास करने की संभावनाएं बढ़ेंगी।
यदि कंपनी इस तकनीक को सफलतापूर्वक विकसित और प्रमाणित कर पाती है, तो भविष्य में भारतीय सैटेलाइट निर्माताओं और अंतरिक्ष मिशनों को स्वदेशी प्रोपल्शन विकल्प मिल सकता है। इससे आयात पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है।
6. जापानी कंपनी Axelspace के साथ भी की साझेदारी
Manastu Space के लिए अक्टूबर 2026 का महीना एक और बड़ी उपलब्धि लेकर आया। कंपनी ने जापान की स्पेस टेक्नोलॉजी कंपनी Axelspace Corporation के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं।
इस साझेदारी का उद्देश्य Manastu Space की ग्रीन प्रोपल्शन तकनीक को जापानी कंपनी के अंतरिक्ष यानों में इस्तेमाल करने की संभावनाओं का मूल्यांकन करना है। दोनों कंपनियां भविष्य में अंतरिक्ष में तकनीक का प्रदर्शन करने की संभावना भी तलाशेंगी।
हालांकि, यह समझौता अभी शुरुआती तकनीकी मूल्यांकन का हिस्सा है। इसे किसी पक्के लॉन्च कॉन्ट्रैक्ट या सफल इंटीग्रेशन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
फिर भी, यह साझेदारी भारतीय स्पेस स्टार्टअप के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी तकनीक पेश करने का अवसर खोल सकती है।
भारत के अंतरिक्ष उद्योग को मिल सकती है नई पहचान
Manastu Space को मिलने वाला ₹116 करोड़ का सरकारी समर्थन केवल एक स्टार्टअप के लिए वित्तीय उपलब्धि नहीं है, बल्कि भारत के उभरते डीप टेक और स्पेस इकोसिस्टम के लिए भी महत्वपूर्ण कदम है।
आज दुनिया में सैटेलाइट की संख्या बढ़ रही है और उनके संचालन के लिए बेहतर प्रोपल्शन तकनीक की मांग भी बढ़ रही है। ऐसे में सुरक्षित, विश्वसनीय और किफायती प्रणालियों का विकास अंतरिक्ष उद्योग की बड़ी जरूरत बन चुका है।
यदि Manastu Space अपनी तकनीक को TRL-9 तक पहुंचाने में सफल रहती है, तो भारत को सैटेलाइट प्रोपल्शन के क्षेत्र में एक मजबूत स्वदेशी विकल्प मिल सकता है। इससे घरेलू अंतरिक्ष कंपनियों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों के लिए भी नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
हालांकि, इस प्रोजेक्ट की वास्तविक सफलता का आकलन तकनीक के अंतिम परीक्षण, उसकी विश्वसनीयता और व्यावसायिक इस्तेमाल के परिणामों से ही होगा। फिलहाल सरकार का यह समर्थन भारत के निजी स्पेस सेक्टर को नई ऊंचाई देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।
