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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाकात के बाद व्यापारियों ने वापस लिया ‘No UPI Day’ का आह्वान

UPI लेनदेन पर प्रस्तावित Merchant Discount Rate (MDR) को लेकर 2 अक्टूबर को होने वाला “No UPI Day” विरोध फिलहाल वापस ले लिया गया है। करीब 20 व्यापार प्रतिनिधियों ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाकात कर छोटे और मध्यम कारोबारियों पर संभावित असर को लेकर अपनी चिंताएं रखीं। सरकार की ओर से मुद्दों पर विचार किए जाने के आश्वासन के बाद AIMRA और AICPDF ने विरोध का आह्वान वापस लेने का फैसला किया।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाकात के बाद व्यापारियों ने वापस लिया ‘No UPI Day’ का आह्वान
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द्वारा जीत निर्मल

स्रोत: Inc42, Economic Times, Business Standard और The New Indian Express की 30 सितंबर–1 अक्टूबर 2026 की रिपोर्टें। इन रिपोर्टों के अनुसार AIMRA और AICPDF ने विरोध वापस लिया है, जबकि MDR से संबंधित उनकी मांगों पर विचार होना बाकी है।

2 अक्टूबर को नहीं होगा ‘No UPI Day’

UPI भुगतान को लेकर व्यापारियों और सरकार के बीच जारी विवाद में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। All India Mobile Retailers Association (AIMRA) और All India Consumer Products Distributors Federation (AICPDF) ने 2 अक्टूबर 2026 के लिए प्रस्तावित “No UPI Day” विरोध वापस ले लिया है।

यह फैसला नई दिल्ली में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ व्यापार प्रतिनिधियों की बैठक के बाद लिया गया। विभिन्न राज्यों से आए करीब 20 व्यापार और रिटेल प्रतिनिधियों ने बैठक में हिस्सा लिया और प्रस्तावित UPI Merchant Discount Rate को लेकर अपनी चिंताएं रखीं।

व्यापारी संगठनों के मुताबिक बातचीत सकारात्मक रही और उन्हें आश्वासन मिला कि उनकी चिंताओं पर विचार किया जाएगा। इसी के बाद विरोध वापस लेने का फैसला हुआ।

आखिर क्यों किया जा रहा था विरोध?

विवाद की मुख्य वजह चुनिंदा merchant UPI transactions पर प्रस्तावित MDR है।

रिपोर्टों के मुताबिक ₹2,000 से अधिक के पात्र merchant UPI payments पर 0.40% MDR लागू करने का प्रस्ताव है। व्यापारिक संगठनों का कहना है कि इस तरह का शुल्क कम मार्जिन पर कारोबार करने वाले छोटे और मध्यम व्यापारियों की लागत बढ़ा सकता है।

MDR मूल रूप से वह शुल्क है जो किसी डिजिटल भुगतान को स्वीकार करने पर merchant से लिया जाता है।

व्यापारी संगठनों की चिंता केवल शुल्क की दर को लेकर नहीं है। उनका तर्क है कि अगर भुगतान स्वीकार करने की लागत बढ़ती है तो इसका असर डिजिटल पेमेंट अपनाने की प्रवृत्ति पर भी पड़ सकता है।

व्यापारियों ने वित्त मंत्री के सामने क्या मांगें रखीं?

प्रतिनिधिमंडल ने सरकार से प्रस्तावित MDR को फिलहाल टालने की मांग की है। व्यापारियों का तर्क है कि त्योहारी सीजन के दौरान कारोबार बढ़ता है और ऐसे समय नई भुगतान लागत लागू होने से छोटे व्यवसायों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

व्यापारी संगठनों ने प्रस्तावित ₹1 लाख की सीमा की समीक्षा कर इसे ₹5 लाख तक बढ़ाने की मांग भी रखी।

इसके अलावा merchant-to-merchant यानी M2M transactions को MDR के दायरे से बाहर रखने और पूरे मुद्दे का अध्ययन करने के लिए एक विशेष समिति बनाने की मांग भी सामने रखी गई है।

कुछ व्यापारिक प्रतिनिधियों ने चरणबद्ध तरीके से MDR लागू करने का विकल्प भी सुझाया है।

विरोध वापस हुआ, लेकिन MDR का मुद्दा खत्म नहीं

“No UPI Day” वापस लेने का मतलब यह नहीं है कि व्यापारियों ने प्रस्तावित MDR को स्वीकार कर लिया है।

उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार पात्र merchant UPI transactions पर प्रस्तावित 0.40% शुल्क फिलहाल 15 अक्टूबर से लागू होने की दिशा में है। व्यापारिक संगठन उम्मीद कर रहे हैं कि उससे पहले उनकी मांगों पर सरकार विचार करेगी।

यही इस घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है—विरोध प्रदर्शन फिलहाल टल गया है, लेकिन नीति को लेकर बातचीत जारी है।

हर UPI भुगतान पर नहीं लगेगा शुल्क

UPI उपयोगकर्ताओं के लिए इस मुद्दे को समझना भी महत्वपूर्ण है।

प्रस्तावित व्यवस्था को इस तरह नहीं समझा जाना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति को हर UPI transaction पर 0.40% अतिरिक्त भुगतान करना होगा।

रिपोर्टों के मुताबिक peer-to-peer (P2P) UPI transactions पर शुल्क नहीं लगाया गया है। वहीं ₹2,000 तक के merchant transactions भी MDR से बाहर रहते हैं।

NPCI ने भी कहा है कि ₹2,000 तक के transactions zero-MDR व्यवस्था में बने रहेंगे। सरकारी आंकड़ों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि इस सीमा तक के भुगतान UPI merchant transaction volume के 96% से अधिक हैं।

इसलिए प्रस्तावित बदलाव मुख्य रूप से पात्र उच्च-मूल्य merchant transactions से जुड़ा मुद्दा है।

छोटे कारोबारियों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है MDR विवाद?

UPI अब भारत में रोजमर्रा के भुगतान का प्रमुख माध्यम बन चुका है। छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े रिटेल कारोबार तक इसका व्यापक इस्तेमाल होता है।

व्यापारिक संगठनों का तर्क है कि कम मार्जिन वाले व्यवसायों में मामूली प्रतिशत शुल्क भी मुनाफे पर अनुपातिक रूप से बड़ा प्रभाव डाल सकता है।

दूसरी ओर, MDR व्यवस्था का दायरा सीमित रखा गया है और छोटे मूल्य के अधिकांश merchant transactions को इससे बाहर रखने की बात सामने आई है।

इसी वजह से बहस का केंद्र केवल यह नहीं है कि MDR होना चाहिए या नहीं, बल्कि यह भी है कि शुल्क किन व्यापारियों और किन transactions पर लागू हो, इसकी सीमा क्या हो और डिजिटल भुगतान की स्वीकार्यता पर इसका क्या असर पड़े।

सरकार और व्यापारियों की बातचीत अब अहम

फिलहाल “No UPI Day” वापस लिए जाने से 2 अक्टूबर को संभावित विरोध को लेकर बनी अनिश्चितता कम हुई है।

लेकिन अगला महत्वपूर्ण चरण सरकार द्वारा व्यापारिक संगठनों की मांगों पर लिए जाने वाले निर्णय का होगा। खास तौर पर MDR की दर, transaction threshold, M2M payments और implementation timeline पर आगे होने वाली स्पष्टता व्यापारियों के लिए महत्वपूर्ण रहेगी।

इस घटनाक्रम से यह भी संकेत मिलता है कि सरकार और व्यापारिक संगठन फिलहाल टकराव के बजाय बातचीत के जरिए समाधान तलाशने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

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