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बेंगलुरु की भागदौड़ छोड़ गोवा में बस गया कपल, ₹75,500 खर्च कर शुरू की नई जिंदगी; वायरल वीडियो में बताया पूरा हिसाब

बेंगलुरु के एक कपल ने अपने अनुभव से इस सवाल का दिलचस्प जवाब दिया है। करीब सात साल तक बेंगलुरु में रहने के बाद राधिका और एकांश ने गोवा में नई जिंदगी शुरू करने का फैसला किया। दोनों ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो साझा करके बताया कि शहर बदलने में उन्हें लगभग ₹75,500 का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ा। उनका यह वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में है और लोग नौकरी, खर्च और बेहतर जीवनशैली को लेकर अपनी राय दे रहे हैं।

बेंगलुरु की भागदौड़ छोड़ गोवा में बस गया कपल, ₹75,500 खर्च कर शुरू की नई जिंदगी; वायरल वीडियो में बताया पूरा हिसाब
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द्वारा साधना गुप्ता

स्रोत: ndtv, money controll,

सात साल बाद क्यों छोड़ा बेंगलुरु?

राधिका और एकांश लंबे समय से बेंगलुरु में कॉर्पोरेट सेक्टर में काम कर रहे थे। दोनों प्रोडक्ट मैनेजमेंट से जुड़े पेशेवर हैं। बेंगलुरु की तेज जीवनशैली, लगातार व्यस्त दिनचर्या और महानगर के खर्चों के बीच उन्होंने एक अलग तरह की जिंदगी जीने का फैसला किया। यह निर्णय अचानक नहीं लिया गया था। दोनों एक साल से ज्यादा समय से शहर बदलने की योजना बना रहे थे। उनकी इच्छा ऐसी जगह रहने की थी, जहां समुद्र के करीब समय बिताने, नई गतिविधियों में शामिल होने और पेशेवर जीवन के साथ व्यक्तिगत रुचियों को भी महत्व देने का अवसर मिले। आखिरकार, रिमोट जॉब की सुविधा मिलने के बाद उन्होंने गोवा को अपना नया ठिकाना बनाया।

बेंगलुरु से गोवा शिफ्ट होने में कितना खर्च आया?

कपल ने इंस्टाग्राम अकाउंट @radhi.and.ekansh पर अपनी शिफ्टिंग से जुड़े प्रमुख खर्च साझा किए। उनके अनुसार, बेंगलुरु की पुरानी सोसाइटी छोड़ने, सामान पैक कराने और स्टोरेज की व्यवस्था करने में करीब ₹15,000 खर्च हुए। फर्नीचर और दूसरे घरेलू सामान को बेंगलुरु से गोवा पहुंचाने में ₹24,000 लगे। कार से गोवा जाने के दौरान पेट्रोल, सर्विसिंग, प्रदूषण प्रमाणपत्र और यात्रा से जुड़े अन्य खर्चों को मिलाकर लगभग ₹10,000 खर्च हुए। गोवा पहुंचने के बाद अलग-अलग इलाकों में घर देखने के लिए आवाजाही पर ₹5,000 का पेट्रोल लगा। खाने-पीने और किराने के सामान पर करीब ₹12,000 खर्च हुए। नए घर में एसी, वॉशिंग मशीन और अन्य जरूरी व्यवस्थाएं करवाने में करीब ₹9,500 खर्च करने पड़े। इन मदों को जोड़ने पर कुल अतिरिक्त खर्च ₹75,500 हुआ।

तीन सप्ताह तक Airbnb में रहे, ₹45 हजार का किराया अलग

गोवा पहुंचने के बाद राधिका और एकांश को तुरंत पसंद का घर नहीं मिला। दोनों ने करीब तीन सप्ताह तक अलग-अलग घरों की तलाश की। इस दौरान उन्हें Airbnb में रहना पड़ा, जिस पर लगभग ₹45,000 खर्च हुए। हालांकि कपल ने इस रकम को अपने ₹75,500 के अतिरिक्त शिफ्टिंग खर्च में शामिल नहीं किया। उनका तर्क था कि यदि वे बेंगलुरु में रहते, तो भी उन्हें उस अवधि का किराया देना पड़ता। इसलिए ₹75,500 को गोवा जाने का संपूर्ण नकद खर्च समझना सही नहीं होगा। इसमें अस्थायी ठहरने का ₹45,000 शामिल नहीं है।

पहले बेंगलुरु में हर महीने खर्च होते थे ₹1.30 लाख

राधिका और एकांश इससे पहले भी अपने मासिक खर्च को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा में रह चुके हैं।मई 2026 में साझा किए गए वीडियो में उन्होंने बताया था कि बेंगलुरु में उनका कुल मासिक खर्च लगभग इसमें सबसे बड़ा हिस्सा मकान के किराए का था, जिसके लिए वे हर महीने ₹56,000 देते थे। इसके अतिरिक्त किराने का सामान, घरेलू मदद, बिजली, इंटरनेट, परिवहन, शॉपिंग और बाहर खाने जैसे खर्च भी शामिल थे। कपल ने बताया था कि अच्छी आय होने के बावजूद महानगर में लगातार बढ़ते खर्चों के कारण बचत करना चुनौतीपूर्ण महसूस होता था।

गोवा जाने के लिए रिमोट जॉब बनी सबसे बड़ी मदद

कपल के इस फैसले में वर्क फ्रॉम होम की सुविधा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राधिका ने एक अन्य वीडियो में बताया कि उन्होंने फरवरी में LinkedIn के माध्यम से रिमोट प्रोडक्ट मैनेजमेंट नौकरियां खोजना शुरू किया था। उन्होंने कंपनियों के कर्मचारियों से संपर्क किया और रेफरल की सहायता से नौकरी के अवसर तलाशे। रिमोट जॉब मिलने के बाद दोनों के लिए बेंगलुरु में रहना अनिवार्य नहीं रहा। इससे उन्हें अपनी पसंद के शहर में रहते हुए पेशेवर जिम्मेदारियां निभाने की सुविधा मिली।

गोवा पहुंचकर सामने आईं कई नई परेशानियां

गोवा की खूबसूरती के बावजूद वहां बसने का शुरुआती अनुभव पूरी तरह आसान नहीं रहा। कपल के अनुसार, कई इलाकों में मोबाइल नेटवर्क और बिजली की समस्या ने उन्हें परेशान किया। कुछ स्थानों पर इंटरनेट कनेक्टिविटी इतनी कमजोर थी कि मोबाइल पर OTP प्राप्त करने के लिए भी बाहर जाना पड़ता था। इसके अलावा, उन्होंने बताया कि कैफे, रेस्तरां और किराने की कुछ वस्तुओं की कीमतें उम्मीद से अधिक थीं। राधिका और एकांश ने 25 से ज्यादा अपार्टमेंट देखने के बाद अपनी जरूरतों के अनुसार घर चुना। इन अनुभवों ने उन्हें समझाया कि किसी स्थान पर छुट्टियां मनाना और वहां रोजमर्रा की जिंदगी बिताना दो अलग बातें हैं।

क्या गोवा जाने के बाद सच में जिंदगी आसान हुई?

राधिका और एकांश ने स्वीकार किया कि गोवा आने से उन्हें रहने की जगह चुनने की आजादी जरूर मिली, लेकिन नौकरी की जिम्मेदारियां समाप्त नहीं हुईं। एकांश ने बताया कि ऑनलाइन मीटिंग और काम की समय-सीमाओं के कारण वह अब भी अपने पूरे दिन का समय मनमर्जी से इस्तेमाल नहीं कर सकते। उनके अनुभव से यह बात सामने आती है कि केवल शहर बदलने से काम का तनाव अपने आप समाप्त नहीं होता। शांत वातावरण मिलने के बावजूद बेहतर जीवनशैली के लिए कार्य समय और व्यक्तिगत जीवन के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।

₹75 हजार खर्च करना क्यों लगा सही फैसला?

राधिका ने वीडियो में अपने फैसले को सही बताते हुए खर्च की तुलना गोवा की छुट्टियों से की। उनके मुताबिक, कई लोग गोवा में पांच दिन घूमने के लिए ₹30,000 से ₹40,000 तक खर्च कर देते हैं। इसके मुकाबले उन्होंने लगभग ₹75,000 अतिरिक्त खर्च करके वहां लंबे समय तक रहने की व्यवस्था शुरू की। कपल का मानना है कि नई जगह रहने और अलग जीवनशैली का अनुभव लेने के लिए यह रकम खर्च करना उनके लिए उचित फैसला था। हालांकि यह उनका व्यक्तिगत आकलन है। गोवा में रहने की वास्तविक लागत हर व्यक्ति के मकान, नौकरी और जीवनशैली के अनुसार अलग हो सकती है।

सोशल मीडिया पर लोगों ने दी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं

राधिका और एकांश की कहानी सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कई लोगों ने उनके फैसले की प्रशंसा की। कुछ यूजर्स ने गोवा में उनका स्वागत किया, जबकि अन्य लोगों ने बेंगलुरु की व्यस्त दिनचर्या से दूर जाने के फैसले को दिलचस्प बताया। वहीं कुछ यूजर्स का कहना था कि रिमोट जॉब मिलने के बाद भी काम का दबाव बना रहता है, इसलिए शहर बदलना हर समस्या का समाधान नहीं हो सकता। इस चर्चा ने महानगरों के खर्च, रिमोट वर्क और जीवन की प्राथमिकताओं को लेकर नई बहस शुरू कर दी है।

नई शुरुआत का फैसला, लेकिन तैयारी है जरूरी

राधिका और एकांश की कहानी उन लोगों के लिए दिलचस्प है, जो बड़े शहरों की भागदौड़ से दूर जाकर नई जगह बसने का सपना देखते हैं। लेकिन उनका अनुभव दिखाता है कि ऐसे फैसले में केवल पसंदीदा जगह का चुनाव करना पर्याप्त नहीं है। नौकरी की स्थिरता, इंटरनेट, रहने की सुविधा और शिफ्टिंग के खर्चों की योजना बनाना भी जरूरी है। करीब ₹75,500 के अतिरिक्त खर्च से शुरू हुआ यह सफर कपल के लिए केवल घर बदलने का फैसला नहीं, बल्कि अपनी जीवनशैली को नए तरीके से व्यवस्थित करने की कोशिश है। उनकी कहानी यही सवाल छोड़ती है—क्या बेहतर जिंदगी के लिए बड़ा शहर छोड़ना जरूरी है, या सही संतुलन बनाना अधिक महत्वपूर्ण?

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