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डिजिटल अरेस्ट के नाम पर साइबर ठगी: चंडीगढ़ ट्राइसिटी में तीन मामलों में ₹1.16 करोड़ से ज्यादा की धोखाधड़ी।

चंडीगढ़: फोन पर अचानक पुलिस अधिकारी की आवाज सुनाई दे और वह कहे कि आपका नाम मनी लॉन्ड्रिंग या आतंकवाद से जुड़े किसी मामले में सामने आया है, तो कोई भी व्यक्ति घबरा सकता है। साइबर अपराधी इसी डर को हथियार बनाकर लोगों की जिंदगीभर की कमाई पर हाथ साफ कर रहे हैं। चंडीगढ़ ट्राइसिटी में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगी के तीन अलग-अलग मामले सामने आए हैं। इनमें एक बुजुर्ग दंपती सहित चार लोगों को निशाना बनाया गया और कुल 1.16 करोड़ रुपये से अधिक की रकम ठग ली गई।

डिजिटल अरेस्ट के नाम पर साइबर ठगी: चंडीगढ़ ट्राइसिटी में तीन मामलों में ₹1.16 करोड़ से ज्यादा की धोखाधड़ी।
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द्वारा साधना गुप्ता

स्रोत: हिंदुस्तान टाइम्स, mirror now , the tribune , PIB.

पुलिस के मुताबिक, आरोपियों ने खुद को चंडीगढ़ पुलिस, एंटी टेररिस्ट स्क्वॉड (ATS) और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) का अधिकारी बताकर पीड़ितों को डराया। किसी को मनी लॉन्ड्रिंग की जांच में फंसाने की धमकी दी गई, तो किसी पर आतंकवाद को फंडिंग करने का आरोप लगाया गया। इन घटनाओं ने एक बार फिर डिजिटल अरेस्ट के नाम पर चल रहे साइबर अपराध के खतरनाक तरीके को सामने ला दिया है।

पहला मामला: 78 वर्षीय बुजुर्ग से ठगे 30.5 लाख रुपये

पहला मामला पंजाब के खरड़ स्थित सनी एन्क्लेव का है। यहां रहने वाले 78 वर्षीय सेवानिवृत्त कर्मचारी को कथित तौर पर फोन करने वाले व्यक्ति ने खुद को चंडीगढ़ पुलिस मुख्यालय का वरिष्ठ निरीक्षक बताया। कॉल करने वाले ने दावा किया कि बुजुर्ग का नाम मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में सामने आया है और उनके खिलाफ जांच चल रही है।

इसके बाद उन्हें कथित तौर पर एक ऐसे व्यक्ति से संपर्क करने को कहा गया, जिसने खुद को एंटी टेररिस्ट फोर्स का अधिकारी बताया। बाद में एक अन्य कॉलर ने NIA अधिकारी बनकर गिरफ्तारी वारंट जारी करने की धमकी दी।

शिकायत के मुताबिक, आरोपियों ने बुजुर्ग को भरोसा दिलाया कि जांच के लिए उनके बैंक खाते में मौजूद रकम का सत्यापन जरूरी है। इसी बहाने उनसे अलग-अलग तारीखों पर RTGS के जरिए पैसे ट्रांसफर करवाए गए। 22 सितंबर को 15 लाख रुपये, 28 सितंबर को 6.5 लाख रुपये और 1 अक्टूबर को 9 लाख रुपये भेजे गए। इस तरह बुजुर्ग को कुल 30.5 लाख रुपये का नुकसान हुआ।

दूसरा मामला: दंपती को आतंकवादी फंडिंग के नाम पर डराया

दूसरी घटना भी खरड़ के सेक्टर 125 इलाके की है। यहां रहने वाले एक दंपती को कथित तौर पर ATS और NIA अधिकारी बनकर फोन किया गया। कॉल करने वालों ने दावा किया कि उनके बैंक खाते में 70 लाख रुपये के संदिग्ध लेन-देन का पता चला है और यह रकम आतंकवादी गतिविधियों से जुड़ी हो सकती है।

मामले को गंभीर दिखाने के लिए आरोपियों ने कथित तौर पर वीडियो कॉल पर पुलिस की वर्दी पहने एक व्यक्ति से भी बात कराई। उस व्यक्ति ने खुद को NIA का प्रमुख बताया और दंपती से पूछताछ की। इस दौरान गिरफ्तारी का डर दिखाकर उन पर पैसे भेजने का दबाव बनाया गया।

शिकायत के अनुसार, दंपती ने एक निजी कंपनी से जुड़े बैंक खाते में 35 लाख रुपये और बैंक ऑफ इंडिया के एक खाते में 10 लाख रुपये ट्रांसफर किए। कुल 45 लाख रुपये भेजने के बाद आरोपियों ने 72 घंटे में क्लियरेंस सर्टिफिकेट देने का वादा किया, लेकिन बाद में उनके फोन बंद हो गए। इसके बाद दंपती को ठगी का एहसास हुआ और उन्होंने साइबर हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराई।

तीसरा मामला: 84 वर्षीय पूर्व पुलिस अधिकारी भी बने शिकार

तीसरा मामला पंचकूला का है, जहां 84 वर्षीय सेवानिवृत्त सेना और चंडीगढ़ पुलिस अधिकारी को कथित तौर पर डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 41 लाख रुपये का चूना लगाया गया।

शिकायत के मुताबिक, 25 अगस्त से उन्हें कई मोबाइल नंबरों से कॉल आने लगे। कॉल करने वालों ने खुद को दिल्ली पुलिस का IPS अधिकारी बताया और दावा किया कि उनके आधार कार्ड का इस्तेमाल करके ऐसे सिम कार्ड लिए गए हैं, जिनका संबंध अवैध वित्तीय लेन-देन से है।

आरोपियों ने उन्हें और उनकी पत्नी को गिरफ्तार करने की धमकी दी। इतना ही नहीं, विदेश में रहने वाले उनके बच्चों को भी मामले में फंसाने की बात कही गई। डर का माहौल बनाने के लिए कथित तौर पर वित्त मंत्रालय के नाम से फर्जी दस्तावेज भी भेजे गए।

इसके बाद पीड़ित ने 3 सितंबर को 25 लाख रुपये और 7 सितंबर को 16 लाख रुपये अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर किए। कुल 41 लाख रुपये गंवाने के बाद उन्हें ठगी का पता चला और उन्होंने पुलिस से संपर्क किया।

आखिर कैसे काम करता है डिजिटल अरेस्ट का जाल?

डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी का ऐसा तरीका है, जिसमें अपराधी खुद को पुलिस, CBI, ED, NIA या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं। वे दावा करते हैं कि पीड़ित का आधार कार्ड, मोबाइल नंबर, बैंक खाता या कोई पार्सल किसी गंभीर अपराध से जुड़ा है।

इसके बाद फर्जी नोटिस, गिरफ्तारी वारंट और सरकारी दस्तावेज भेजे जाते हैं। कई बार वीडियो कॉल पर पुलिस की वर्दी पहने व्यक्ति को दिखाकर पीड़ित का भरोसा जीतने की कोशिश की जाती है। लोगों को परिवार से बात न करने, घर से बाहर न निकलने और लगातार वीडियो कॉल पर बने रहने के लिए कहा जाता है।

आखिर में जांच या बैंक खाते के सत्यापन के नाम पर रकम ट्रांसफर करने का दबाव बनाया जाता है। पीड़ित को लगता है कि वह कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए अधिकारियों का सहयोग कर रहा है, जबकि वास्तव में उसके साथ धोखाधड़ी हो रही होती है।

याद रखें, भारत में डिजिटल अरेस्ट का कोई कानूनी प्रावधान नहीं

गृह मंत्रालय के तहत काम करने वाले इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) ने स्पष्ट किया है कि भारतीय कानून में डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। कोई भी वास्तविक पुलिस या जांच एजेंसी वीडियो कॉल पर किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करके उसे पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर नहीं करती।

अगर कोई व्यक्ति खुद को सरकारी अधिकारी बताकर गिरफ्तारी की धमकी दे और पैसे मांगने लगे, तो घबराकर कोई भुगतान न करें। कॉल काटें और संबंधित एजेंसी के आधिकारिक नंबर से जानकारी की पुष्टि करें।

यदि आपके साथ ऐसी ठगी हो जाए, तो तुरंत अपने बैंक को सूचित करें और राष्ट्रीय साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 पर कॉल करें। इसके अलावा आधिकारिक पोर्टल cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज कराएं।

चंडीगढ़, खरड़ और पंचकूला की ये घटनाएं बताती हैं कि साइबर अपराधी अब सिर्फ तकनीक का इस्तेमाल नहीं कर रहे, बल्कि लोगों के डर और भरोसे को भी निशाना बना रहे हैं। ऐसे में जागरूकता ही इस तरह की ठगी से बचने का सबसे मजबूत तरीका है।

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