मुंबई में सेलिब्रिटी मैनेजर दिशा सालियान की 2020 में हुई मौत से जुड़ा मामला छह साल बाद फिर एक महत्वपूर्ण कानूनी और राजनीतिक मोड़ पर पहुंच गया है। दिशा के पिता सतीश सालियान ने शिवसेना (UBT) नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री आदित्य ठाकरे तथा पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख को ₹500 करोड़ का मानहानि नोटिस भेजा है। नोटिस में सार्वजनिक माफी, कथित आपत्तिजनक बयानों को वापस लेने और मुआवजा देने की मांग की गई है। रिपोर्टों के अनुसार इसके लिए सात दिन का समय दिया गया है।
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ ही दिन पहले बॉम्बे हाई कोर्ट के निर्देश के बाद CBI ने दिशा सालियान की मौत की परिस्थितियों की जांच के लिए FIR दर्ज की है। लेकिन इस पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है: FIR में दर्ज आरोप, सतीश सालियान के आरोप और अदालत द्वारा सत्यापित निष्कर्ष एक ही चीज नहीं हैं। जांच अभी चल रही है और किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी अभी स्थापित नहीं हुई है।
₹500 करोड़ के नोटिस में क्या कहा गया?
17 सितंबर को सामने आई जानकारी के मुताबिक सतीश सालियान की ओर से अधिवक्ता अनुष्का सोनावणे के माध्यम से भेजे गए कानूनी नोटिस में आरोप लगाया गया है कि आदित्य ठाकरे और अनिल देशमुख ने उनके अपनी बेटी के लिए न्याय मांगने और नई जांच कराने के प्रयासों को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताकर उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया।
नोटिस में यह भी आरोप लगाया गया है कि ऐसे दावे किए गए कि CBI पहले ही मामले की जांच कर चुकी थी और आदित्य ठाकरे को क्लीन चिट मिल चुकी थी। नोटिस भेजने वाले पक्ष का कहना है कि इस तरह के बयानों से सतीश सालियान के कानूनी प्रयासों को राजनीतिक साजिश के रूप में पेश किया गया। ये फिलहाल नोटिस में लगाए गए आरोप हैं, किसी अदालत द्वारा तय किए गए तथ्य नहीं।
इस लेख के प्रकाशन तक उपलब्ध रिपोर्टों में आदित्य ठाकरे या अनिल देशमुख की ओर से इस ₹500 करोड़ के नोटिस पर कोई विस्तृत सार्वजनिक जवाब सामने नहीं आया था।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने वास्तव में क्या कहा?
इस कहानी को समझने के लिए 2 सितंबर 2026 का बॉम्बे हाई कोर्ट का आदेश सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक दस्तावेज है।
सतीश सालियान ने अपनी बेटी की मौत को संदिग्ध बताते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया कि वह याचिकाकर्ता द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों की सत्यता पर कोई निष्कर्ष नहीं दे रहा है। इसके बजाय अदालत ने उपलब्ध सामग्री और पहले हुई जांच की प्रक्रिया को देखते हुए माना कि मामला cognizable offence की substantive investigation की मांग करता है।
हाई कोर्ट ने CBI के मुंबई क्षेत्र के प्रभारी अधिकारी को एक अनुभवी वरिष्ठ अधिकारी नियुक्त करने, सतीश सालियान का बयान दर्ज करने और FIR दर्ज करने का निर्देश दिया। साथ ही अदालत ने विशेष रूप से कहा कि जांच एजेंसी सभी पहलुओं की स्वतंत्र रूप से जांच करे और किसी व्यक्ति को तब तक आरोपी न माना जाए जब तक जांच अधिकारी को एकत्र सामग्री के आधार पर उसके खिलाफ पर्याप्त संदेह का आधार न मिले।
यही इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सावधानी है।
हाई कोर्ट ने हत्या, गैंगरेप या किसी नामित व्यक्ति की संलिप्तता को सिद्ध नहीं माना है। उसने जांच का आदेश दिया है।
पुरानी जांच पर अदालत ने क्यों उठाए सवाल?
हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार मुंबई पुलिस ने 2020 में Accidental Death Report यानी ADR के तहत जांच की थी। दिसंबर 2023 में आगे की जांच दोबारा शुरू हुई और अप्रैल 2026 में प्रस्तुत रिपोर्ट में भी पहले वाले निष्कर्ष को बरकरार रखा गया—कि दिशा की मौत आत्महत्या थी और कोई नया सबूत नहीं मिला। यह निष्कर्ष मई 2026 में संबंधित अधिकारी द्वारा स्वीकार किया गया था।
लेकिन हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड में मौजूद कई परिस्थितियों पर सवाल उठाए और माना कि CrPC की धारा 174 के तहत हुई प्रक्रिया इस मामले के लिए पर्याप्त नहीं थी।
कोर्ट ने घटनास्थल से जुड़े रिकॉर्ड, ADR के समय, पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक सामग्री सहित कई पहलुओं का उल्लेख किया। उदाहरण के लिए, अदालत के आदेश में दर्ज है कि फॉरेंसिक साइंस लैब के सहायक केमिकल एनालाइजर ने ऊंचाई से गिरने के बताए गए घटनाक्रम की तुलना में वस्तुओं पर कम खून होने को लेकर सवाल उठाया था।
फिर भी अदालत ने सावधानीपूर्वक यह भी स्पष्ट किया कि इन परिस्थितियों का उल्लेख केवल यह तय करने के लिए किया गया कि FIR और विस्तृत जांच आवश्यक है—किसी व्यक्ति के खिलाफ निष्कर्ष निकालने के लिए नहीं।
CBI जांच अब कहां खड़ी है?
बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश के बाद CBI ने सतीश सालियान का बयान दर्ज किया और 13 सितंबर को FIR दर्ज की। सरकारी प्रसारक News on AIR ने भी CBI द्वारा FIR दर्ज किए जाने की पुष्टि की है।
यहां मीडिया रिपोर्टिंग में एक महत्वपूर्ण अंतर सामने आया है।
कुछ रिपोर्टों ने लिखा कि आदित्य ठाकरे और अन्य व्यक्तियों के नाम FIR में उन लोगों के रूप में शामिल हैं जिनकी भूमिका की जांच मांगी गई है। दूसरी ओर, CBI अधिकारी के हवाले से प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया कि इस चरण पर किसी आरोपी का नाम तय नहीं किया गया है और नाम तभी जोड़े जाएंगे जब जांच में संलिप्तता स्थापित करने वाली सामग्री सामने आएगी।
इसलिए किसी व्यक्ति को अभी “दोषी” या जांच द्वारा अपराध में शामिल पाया गया बताना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।
आदित्य ठाकरे ने क्या कहा?
CBI FIR के बाद आदित्य ठाकरे ने सार्वजनिक रूप से आरोपों से इनकार किया। उन्होंने कहा कि वह दिशा सालियान से कभी मिले या उन्हें जानते तक नहीं थे और लगातार अपना नाम मामले से जोड़े जाने को उन्होंने राजनीतिक और व्यक्तिगत उद्देश्यों से की जा रही “character assassination” बताया।
उन्होंने यह भी कहा कि आधिकारिक पुनः जांच को बिना राजनीतिक या मीडिया हस्तक्षेप के आगे बढ़ने दिया जाना चाहिए।
यह ठाकरे का पक्ष है और इसे उसी रूप में देखा जाना चाहिए—जैसे सतीश सालियान की शिकायत और उसमें दर्ज गंभीर आरोप उनके पक्ष के दावे हैं।
दिशा सालियान की मौत से लेकर नई जांच तक
दिशा सालियान की जून 2020 में मुंबई के मलाड इलाके की एक ऊंची इमारत से गिरने के बाद मौत हुई थी। पुलिस ने ADR दर्ज कर जांच की। मामले ने इसलिए भी व्यापक सार्वजनिक ध्यान खींचा क्योंकि अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत, जिनके साथ दिशा ने पेशेवर रूप से काम किया था, कुछ दिन बाद मृत पाए गए।
महत्वपूर्ण रूप से, हाई कोर्ट के रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि पहले की जांच के दौरान दिशा के माता-पिता के बयानों में किसी अपराध को लेकर संदेह नहीं जताया गया था। बाद में सतीश सालियान ने अपना रुख बदला और गंभीर आरोप लगाते हुए स्वतंत्र जांच की मांग की। अदालत ने इन आरोपों को सत्य घोषित नहीं किया, लेकिन रिकॉर्ड में दिखाई देने वाली परिस्थितियों के कारण विस्तृत आपराधिक जांच जरूरी मानी।
₹500 करोड़ का आंकड़ा क्या साबित करता है?
₹500 करोड़ की राशि सुर्खियों में बड़ी दिखती है, लेकिन कानूनी रूप से इसे अदालत द्वारा तय मुआवजा समझना गलत होगा।
यह सतीश सालियान की ओर से कानूनी नोटिस में मांगी गई damages की राशि है। अदालत ने अभी ₹500 करोड़ का हर्जाना देने का आदेश नहीं दिया है। इसी तरह नोटिस भेजे जाने का अर्थ यह भी नहीं है कि मानहानि साबित हो गई है। यदि विवाद अदालत तक जाता है, तो संबंधित पक्षों के दावे, बचाव और उपलब्ध साक्ष्य न्यायिक परीक्षण के अधीन होंगे।
इस मामले में इसलिए दो समानांतर कानूनी घटनाक्रम अलग-अलग समझने जरूरी हैं: एक तरफ दिशा की मौत की परिस्थितियों की CBI जांच है; दूसरी तरफ सतीश सालियान द्वारा कथित मानहानिकारक बयानों को लेकर भेजा गया कानूनी नोटिस।
दोनों को मिलाकर किसी आपराधिक निष्कर्ष पर पहुंचना समय से पहले होगा।
आगे क्या महत्वपूर्ण होगा?
अब सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम CBI की वास्तविक जांच होगी—पुराने पुलिस रिकॉर्ड, गवाहों के बयान, पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक सामग्री तथा घटनास्थल से जुड़े रिकॉर्ड की जांच। हाई कोर्ट ने CBI को सभी पहलुओं की जांच की स्वतंत्रता दी है और यह भी कहा है कि जांच के परिणाम के आधार पर एजेंसी उचित कानूनी धाराएं जोड़ या हटा सकती है। अगर अंततः कोई अपराध नहीं बनता, तो एजेंसी उपयुक्त summary दाखिल कर सकती है; उस स्थिति में सतीश सालियान के पास उसे चुनौती देने का अधिकार रहेगा।
इसलिए सितंबर 2026 का सबसे महत्वपूर्ण बदलाव ₹500 करोड़ की रकम नहीं, बल्कि यह है कि 2020 की मौत की परिस्थितियां अब एक नई substantive CBI investigation के दायरे में हैं। नोटिस ने विवाद का एक अलग मानहानि संबंधी आयाम जोड़ा है, लेकिन मूल प्रश्न—दिशा सालियान की मौत किन परिस्थितियों में हुई और क्या कोई अपराध हुआ था—अभी जांच का विषय है।
