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IIT Bombay का अनोखा कदम: आवारा कुत्तों को मिले QR-Code ID, स्कैन करते ही सामने आएगी पूरी जानकारी

IIT Bombay परिसर में रहने वाले सामुदायिक कुत्तों की पहचान और देखभाल को आसान बनाने के लिए QR-Code वाले कॉलर इस्तेमाल किए जा रहे हैं। इन्हें स्कैन करने पर संबंधित कुत्ते की पहचान, वैक्सीनेशन रिकॉर्ड और उससे जुड़ी लोकेशन की जानकारी डिजिटल रूप से देखी जा सकती है। इस पहल का वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में है।

IIT Bombay का अनोखा कदम: आवारा कुत्तों को मिले QR-Code ID, स्कैन करते ही सामने आएगी पूरी जानकारी
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द्वारा जीत निर्मल

स्रोत: TOI

IIT Bombay के कैंपस डॉग्स को मिली QR वाली पहचान

मुंबई स्थित Indian Institute of Technology Bombay (IIT Bombay) के परिसर में रहने वाले आवारा या सामुदायिक कुत्तों की देखभाल में तकनीक का दिलचस्प इस्तेमाल सामने आया है। कैंपस के कुत्तों को ऐसे कॉलर दिए गए हैं जिन पर QR Code लगा है। इसे मोबाइल से स्कैन करने पर उस विशेष कुत्ते से जुड़ी डिजिटल जानकारी देखी जा सकती है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य अलग-अलग कुत्तों की पहचान आसान बनाना और उनके स्वास्थ्य से संबंधित रिकॉर्ड को एक जगह उपलब्ध कराना है।

QR Code स्कैन करने पर क्या जानकारी मिलेगी?

रिपोर्टों के मुताबिक QR-Code प्रोफाइल में कुत्ते की यूनिक पहचान, उसके वैक्सीनेशन से जुड़ी जानकारी और कैंपस में उससे संबंधित लोकेशन रिकॉर्ड जैसी जानकारियां उपलब्ध हो सकती हैं। कुछ मामलों में पिछली बार QR Code कहां स्कैन किया गया था, उसका रिकॉर्ड भी डिजिटल प्रोफाइल से जुड़ सकता है।

इसका फायदा यह है कि देखने में एक जैसे लगने वाले कई कुत्तों के बीच सही जानवर की पहचान करना आसान हो सकता है। किसी कुत्ते को उपचार की आवश्यकता होने पर केयरटेकर उसके उपलब्ध स्वास्थ्य रिकॉर्ड को जल्दी जांच सकते हैं।

सोशल मीडिया पर क्यों हो रही चर्चा?

QR-Code कॉलर दिखाने वाला वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद इस पहल ने लोगों का ध्यान खींचा। कई यूजर्स ने इसे अपने इलाकों के स्ट्रीट डॉग्स के लिए भी उपयोग करने में दिलचस्पी दिखाई। वहीं कुछ प्रतिक्रियाओं में इसे मजाकिया अंदाज में कुत्तों का ‘Aadhaar’ भी कहा गया।

हालांकि इसे वास्तविक आधार कार्ड समझना सही नहीं होगा। यहां ‘Aadhaar’ शब्द का इस्तेमाल डिजिटल पहचान की अवधारणा समझाने के लिए अनौपचारिक रूप से किया जा रहा है।

IIT Bombay में पहले से मौजूद है Animal Welfare व्यवस्था

यह पहल बिल्कुल अलग-थलग प्रयोग नहीं है। IIT Bombay में सामुदायिक जानवरों के प्रबंधन और कल्याण से जुड़ी व्यवस्था पहले से मौजूद है।

IIT Bombay के Animal Welfare Group के पुराने आधिकारिक विवरण के मुताबिक परिसर में कुत्तों की नसबंदी, वैक्सीनेशन और डेटाबेस बनाए रखने जैसे काम किए जाते रहे हैं।

संस्थान की 2024 की community-animal policy में भी Public Health Office और animal caretakers की मदद से सामुदायिक कुत्तों और बिल्लियों के लिए नियमित वैक्सीनेशन तथा sterilisation drives आयोजित करने का प्रावधान है।

ऐसे में QR-Code आधारित डिजिटल रिकॉर्ड मौजूदा पशु-कल्याण व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित बनाने का एक तकनीकी माध्यम बन सकता है।

QR-Code ID क्यों हो सकती है उपयोगी?

किसी बड़े कैंपस या आवासीय क्षेत्र में बड़ी संख्या में सामुदायिक कुत्ते होने पर प्रत्येक जानवर का रिकॉर्ड अलग-अलग रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

QR आधारित पहचान से तीन महत्वपूर्ण फायदे संभव हैं—पहचान में आसानी, वैक्सीनेशन रिकॉर्ड तक तेज पहुंच और देखभाल करने वालों के बीच बेहतर सूचना साझा करना।

विशेष रूप से रेबीज वैक्सीनेशन जैसी जानकारी आसानी से उपलब्ध होना महत्वपूर्ण हो सकता है। सही और नियमित रूप से अपडेट किया गया डिजिटल डेटाबेस पशु-कल्याण टीमों को यह समझने में मदद कर सकता है कि किस जानवर को अगली वैक्सीन या चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता है।

मुंबई में भी QR Collar की दिशा में पहल

IIT Bombay का मामला ऐसे समय सामने आया है जब मुंबई में सामुदायिक कुत्तों के प्रबंधन में तकनीक के इस्तेमाल पर ध्यान बढ़ रहा है। रिपोर्टों के अनुसार Brihanmumbai Municipal Corporation (BMC) ने भी QR-enabled reflective collars के जरिए कुत्तों के रेबीज वैक्सीनेशन और sterilisation जैसी जानकारी रिकॉर्ड करने की दिशा में पहल की है।

इससे संकेत मिलता है कि QR Code जैसी कम लागत वाली तकनीक भविष्य में शहरी पशु प्रबंधन का उपयोगी हिस्सा बन सकती है।

क्या पूरे भारत में लागू हो सकता है ऐसा सिस्टम?

तकनीकी रूप से QR आधारित पहचान प्रणाली को कॉलेज कैंपस, हाउसिंग सोसायटी या स्थानीय निकायों के स्तर पर अपनाना संभव हो सकता है। लेकिन बड़े स्तर पर इसकी सफलता केवल QR टैग लगाने पर निर्भर नहीं करेगी।

डेटाबेस को नियमित रूप से अपडेट करना, कॉलर खराब या गायब होने पर उसे बदलना, वैक्सीनेशन और नसबंदी रिकॉर्ड की पुष्टि करना तथा जिम्मेदार संस्था तय करना भी जरूरी होगा।

इसलिए IIT Bombay में दिखाई दे रहा मॉडल दिलचस्प उदाहरण जरूर है, लेकिन इसे बड़े शहर या राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने से पहले संचालन, लागत, डेटा प्रबंधन और पशु-कल्याण से जुड़े व्यावहारिक पहलुओं पर भी ध्यान देना होगा।

संतुलित विश्लेषण: तकनीक समाधान है, लेकिन अकेले पर्याप्त नहीं

QR-Code ID सामुदायिक कुत्तों की पहचान और रिकॉर्ड प्रबंधन को आसान बना सकती है, लेकिन यह अपने आप में stray-dog management की पूरी समस्या का समाधान नहीं है।

कुत्तों की नियमित वैक्सीनेशन, नसबंदी, घायल जानवरों का उपचार, जिम्मेदार feeding practices और मानव-पशु संघर्ष को कम करने के उपाय समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

इस पहल की वास्तविक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि डिजिटल रिकॉर्ड कितने सही और नियमित रूप से अपडेट किए जाते हैं तथा संबंधित जानवरों की देखभाल में इनका कितना प्रभावी उपयोग होता है।

निष्कर्ष

IIT Bombay के सामुदायिक कुत्तों पर लगे QR-Code कॉलर यह दिखाते हैं कि रोजमर्रा की एक बेहद सामान्य तकनीक को पशु कल्याण में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

मोबाइल से एक QR Code स्कैन कर किसी कुत्ते की पहचान और उपलब्ध स्वास्थ्य संबंधी जानकारी तक पहुंचने की व्यवस्था caretakers के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।

यदि ऐसी प्रणालियों को सटीक डेटाबेस, नियमित वैक्सीनेशन और जिम्मेदार पशु प्रबंधन के साथ जोड़ा जाए, तो यह भारत के दूसरे कैंपस और शहरी क्षेत्रों के लिए भी अध्ययन करने योग्य मॉडल बन सकता है।


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