मोबाइल बना माइक, सोशल मीडिया बना बच्चों की आवाज
महाराष्ट्र के कई हिस्सों में स्कूल और कॉलेज जाने वाले बच्चों ने अपनी रोजमर्रा की मुश्किलों को सामने लाने का एक नया तरीका खोज लिया है। कोई छाते को माइक्रोफोन बनाकर सड़क के गड्ढे दिखा रहा है, कोई मोबाइल फोन के सामने रिपोर्टर बनकर कीचड़ से भरे रास्ते की स्थिति बता रहा है, तो कोई रेलवे ट्रैक से स्कूल जाने का जोखिम रिकॉर्ड कर सीधे सरकार से सवाल पूछ रहा है।
पालघर के वाधिव से लेकर नासिक के गोहिरेवाड़ी, रायगढ़ के खांडपे और सतारा के म्हसवड तक छात्रों के वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बने हैं।
इन वीडियो का असर भी एक जैसा नहीं रहा। कुछ मामलों में प्रशासन ने तेजी से मरम्मत शुरू की, जबकि दूसरे इलाकों में समाधान अभी प्रस्ताव, मंजूरी या सरकारी आश्वासन के स्तर पर है।
पालघर: स्कूल जाने के लिए रेलवे ट्रैक का सहारा
पालघर के वाधिव में स्थिति सड़क के गड्ढों से कहीं अधिक गंभीर है।
16 वर्षीय सोहिल सुनील चौधरी ने 22 अगस्त को इंस्टाग्राम पर एक वीडियो पोस्ट कर बच्चों को रेलवे ट्रैक के रास्ते स्कूल जाते दिखाया। वीडियो में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से गांव की समस्या की ओर ध्यान देने की अपील की।
वाधिव एक द्वीपीय क्षेत्र है और इसे मुख्य भूमि से जोड़ने वाला स्थायी, हर मौसम में इस्तेमाल किया जा सकने वाला सड़क पुल नहीं है। स्थानीय बच्चों को स्कूल पहुंचने के लिए रेलवे पुल और पटरियों के पास बने रास्तों का इस्तेमाल करना पड़ता है।
रेलवे अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि ये रास्ते अधिकृत रेलवे कर्मचारियों के लिए हैं और सामान्य सार्वजनिक आवाजाही के लिए नहीं हैं।
जोखिम का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आठ वर्षीय प्रिंस किशोर भगत हाल में स्कूल जाते समय रेलवे ट्रैक के पास गिर गया था, जब उसका पैर पट्टियों में फंस गया।
ग्रामीणों के अनुसार यह समस्या दशकों पुरानी है। 2019 में मुंबई के आजाद मैदान में भी इसे लेकर विरोध प्रदर्शन किया गया था, जबकि पास के फणसपाड़ा स्थित सरस्वती विद्यालय लगभग 25 वर्षों से बच्चों द्वारा रेलवे ट्रैक पार करने की समस्या उठाता रहा है।
वाधिव के लिए ₹25.95 करोड़ के पुल का प्रस्ताव
बच्चों और ग्रामीणों की मांग के बीच अब प्रशासनिक स्तर पर एक प्रस्ताव सामने आया है।
1 सितंबर को जिला प्रशासन ने वाधिव और वैती को जोड़ने के लिए लगभग 700 मीटर लंबे स्थायी पुल का प्रस्ताव तैयार किया। इसकी अनुमानित लागत ₹25.95 करोड़ बताई गई है।
प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजा गया है और अभी प्रशासनिक तथा वित्तीय मंजूरी का इंतजार है।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि वायरल वीडियो के बाद वाधिव की समस्या हल हो चुकी है। फिलहाल स्थायी पुल प्रस्ताव के स्तर पर है। करीब तीन साल पहले ग्रामीणों के लिए जिस फेरी सेवा का वादा किया गया था, वह भी शुरू नहीं हुई है।
नासिक: बच्चों ने खुद बनाई 'ग्राउंड रिपोर्ट'
नासिक के गोहिरेवाड़ी में 11 वर्षीय स्मिता शिद और 10 वर्षीय आदित्य गोहिरे ने अपने स्कूल के रास्ते की स्थिति बताने के लिए रिपोर्टर की भूमिका निभाई।
बच्चों ने एक नकली ग्राउंड रिपोर्ट तैयार की और कीचड़ तथा गड्ढों से भरे रास्ते की समस्या दिखाई। वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैला और राजनीतिक स्तर पर भी ध्यान खींचा। विपक्षी नेता आदित्य ठाकरे ने इलाके का दौरा किया।
लेकिन यहां वायरल होने और राजनीतिक ध्यान मिलने के बावजूद सड़क अभी पूरी नहीं हुई है।
मानसून में रास्ता फिसलन भरा और पानी से भर जाता है। कुछ बच्चे चप्पल उतारकर कीचड़ से गुजरते हैं। भारी बारिश होने पर कई बार बच्चे स्कूल भी नहीं जा पाते।
ग्राम पंचायत के मुताबिक वैकल्पिक सड़क के लिए जमीन की पहचान की गई है और किसानों ने अपनी जमीन का छोटा हिस्सा देने पर सहमति भी जताई है। इसके बावजूद प्रस्ताव अभी प्रशासनिक प्रक्रिया में है।
रायगढ़: छाता बना माइक, वीडियो वायरल हुआ और सड़क की मरम्मत शुरू
रायगढ़ के करजत तालुका के खांडपे गांव में तीन दसवीं कक्षा की छात्राओं ने सड़क के गड्ढों को दिखाने के लिए अपनी खुद की न्यूज रिपोर्ट बनाई।
नेहा घारे ने रिपोर्टर की भूमिका निभाई और छाते को माइ्रोफोन बनाया। ज्योत्स्ना मुकने ने स्थानीय निवासी की भूमिका निभाकर खराब सड़क की शिकायत बताई, जबकि मानसी पवार ने मोबाइल फोन से वीडियो रिकॉर्ड किया।
वीडियो वायरल होने के बाद स्थानीय प्रशासन का ध्यान सड़क की ओर गया।
शिवसेना विधायक महेंद्र थोरवे ने सार्वजनिक रूप से कहा कि सड़क की स्थिति उनके संज्ञान में आने के बाद मरम्मत का काम शुरू किया गया।
हालांकि यहां भी स्थायी समाधान और तत्काल मरम्मत के बीच अंतर महत्वपूर्ण है। स्थानीय PWD अधिकारी के मुताबिक मानसून के दौरान केवल अस्थायी मरम्मत संभव थी और सड़क का पूर्ण पुनर्निर्माण बारिश के बाद किया जाना है।
सतारा: छात्रा की Reel के अगले दिन पुल पर शुरू हुआ काम
सतारा के म्हसवड की कक्षा 12 की छात्रा मानसी माने ने भी अपने कॉलेज पहुंचने की मुश्किल को इंस्टाग्राम रील के जरिए सामने रखा।
वह देवापुर स्थित K.B.P. Krushi Vidyalaya and Junior College जाने वाले रास्ते का इस्तेमाल करती हैं। म्हसवड से लगभग 8 किलोमीटर लंबे इस मार्ग पर सैकड़ों छात्र यात्रा करते हैं, लेकिन रास्ते का बाद का हिस्सा गड्ढों और खराब सतह से प्रभावित है।
मानसी ने इससे पहले माणगंगा नदी के एक खराब पुल की स्थिति भी वीडियो में दिखाई थी। वहां सड़क की सतह टूट चुकी थी और लोहे की reinforcement bars दिखाई दे रही थीं। उस वीडियो के बाद अगले दिन मरम्मत शुरू हुई।
लेकिन कॉलेज जाने वाली सड़क की समस्या अभी खत्म नहीं हुई है।
सितंबर में सड़क पर गड्ढों की स्थिति और खराब पाई गई। मानसी के अनुसार सड़क करीब 15-20 वर्षों से खराब स्थिति में है और इसका असर केवल छात्रों पर नहीं, बल्कि पूरे इलाके के लोगों पर पड़ता है।
सतारा की सड़क के लिए ₹1 करोड़ से अधिक का अनुमान
इस सड़क की मरम्मत के लिए सरकारी प्रक्रिया भी चल रही है।
दहीवडी जिला परिषद कार्यालय के एक डिप्टी इंजीनियर के अनुसार, विधायक जयकुमार गोरे द्वारा मामला उठाए जाने के बाद ₹1 करोड़ से अधिक का अनुमान 1 जुलाई को सतारा जिला परिषद को भेजा गया था।
अधिकारी के मुताबिक मंजूरी मिलने के बाद काम शुरू किया जाएगा।
मानसी ने सड़क के अलावा स्कूल खुलने और छुट्टी होने के समय राज्य परिवहन की बसें उपलब्ध नहीं होने का मुद्दा भी सोशल मीडिया के जरिए उठाया है।
Viral होना समाधान की गारंटी नहीं
महाराष्ट्र के इन अलग-अलग मामलों में एक स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।
रायगढ़ में छात्राओं की रिपोर्ट के बाद सड़क की मरम्मत शुरू हुई। सतारा में पुल से जुड़ी एक पुरानी शिकायत पर वीडियो सामने आने के अगले दिन काम शुरू हुआ। दूसरी ओर नासिक के गोहिरेवाड़ी की सड़क अब भी अधूरी है, जबकि पालघर के वाधिव में ₹25.95 करोड़ के पुल को अभी सरकारी मंजूरी मिलनी बाकी है।
इसलिए सोशल मीडिया ने इन समस्याओं को सार्वजनिक और राजनीतिक एजेंडे पर लाने में भूमिका जरूर निभाई है, लेकिन हर वायरल वीडियो का अर्थ यह नहीं कि समस्या का स्थायी समाधान हो गया।
इन बच्चों की कहानियां एक दूसरी वास्तविकता भी सामने रखती हैं: स्कूल तक पहुंचने जैसी बुनियादी जरूरत के लिए कहीं बच्चों को कीचड़ से गुजरना पड़ रहा है, कहीं गड्ढों से भरी सड़क का सामना करना पड़ रहा है और कहीं रेलवे ट्रैक के किनारे चलना पड़ रहा है।
मोबाइल फोन ने उनकी शिकायतों को हजारों लोगों तक पहुंचाने का रास्ता दिया है। अब असली कसौटी यह होगी कि सोशल मीडिया पर मिली दृश्यता कितनी जगह स्थायी और सुरक्षित बुनियादी ढांचे में बदलती है।
