काठमांडू/पोखरा: नेपाल में भारतीय सेना की गोरखा इकाइयों से जुड़ी दशकों पुरानी भर्ती व्यवस्था को फिर शुरू करने की मांग तेज हो गई है। पोखरा में पूर्व गोरखा सैनिकों और उनके समर्थकों ने प्रदर्शन करते हुए नेपाल सरकार से भारतीय सेना की अग्निपथ योजना के तहत नेपाली युवाओं की भर्ती का रास्ता खोलने की अपील की है।
12 अगस्त को आयोजित इस प्रदर्शन का नेतृत्व Indian Ex-Servicemen Gorkha Brigade Nepal Pokhara ने किया। संगठन ने जिला प्रशासन कार्यालय के माध्यम से संघीय सरकार को दो सूत्रीय ज्ञापन भी सौंपा। इसमें भारतीय सेना में भर्ती तत्काल बहाल करने के साथ पूर्व सैनिक संगठनों से जुड़े एक अन्य प्रशासनिक मुद्दे को उठाया गया।
क्यों रुकी हुई है नेपाली गोरखाओं की भर्ती?
भारत ने 2022 में अग्निपथ योजना लागू की थी। इसके तहत गैर-अधिकारी स्तर पर चुने गए अधिकांश अग्निवीर चार वर्ष तक सेवा करते हैं और लगभग 25 प्रतिशत को आगे नियमित सेवा के लिए चुना जा सकता है। इस नई व्यवस्था के बाद नेपाल ने अपने नागरिकों की भारतीय सेना में भर्ती पर आपत्ति जताई थी।
नेपाल की चिंताओं में प्रमुख मुद्दा 1947 में नेपाल, भारत और ब्रिटेन के बीच बनी गोरखा भर्ती व्यवस्था और नई अग्निपथ सेवा शर्तों के बीच तालमेल का रहा है। नेपाल ने 2022 में निर्धारित गोरखा भर्ती रैलियां स्थगित कर दी थीं।
गोरखा सैनिकों और भारतीय सेना का ऐतिहासिक रिश्ता
नेपाली गोरखाओं का भारतीय सैन्य व्यवस्था से संबंध दो सदियों से भी अधिक पुराना है। ब्रिटिश शासन के समय शुरू हुई गोरखा भर्ती स्वतंत्र भारत की सेना में भी जारी रही। गोरखा रेजिमेंटों ने भारतीय सेना के कई प्रमुख सैन्य अभियानों और युद्धों में भूमिका निभाई है।
यही कारण है कि यह मुद्दा केवल रोजगार तक सीमित नहीं है। नेपाल के कई पूर्व सैनिकों और परिवारों के लिए भारतीय सेना में सेवा सामाजिक प्रतिष्ठा, पारिवारिक परंपरा और आर्थिक सुरक्षा से भी जुड़ी रही है।
'खाड़ी देशों में नौकरी के बजाय सेना में अवसर' की मांग
भर्ती रुकने का एक महत्वपूर्ण पहलू नेपाली युवाओं के रोजगार से जुड़ा है। सीमित घरेलू अवसरों के कारण बड़ी संख्या में नेपाली नागरिक विदेशों में रोजगार तलाशते हैं। गोरखा समुदाय के कई युवाओं के लिए भारतीय सेना लंबे समय तक ऐसा ही एक प्रतिष्ठित विकल्प रही है।
पिछले वर्षों में भर्ती बंद रहने के कारण कुछ युवा नेपाल सेना या ब्रिटिश सेना जैसे विकल्पों की ओर गए हैं, जबकि अन्य खाड़ी देशों, यूरोप और दूसरे विदेशी रोजगार बाजारों का रुख कर रहे हैं। कुछ पूर्व सैनिकों का तर्क है कि भारतीय सेना में सेवा युवाओं को सैन्य परंपरा से जुड़े रहने के साथ बेहतर करियर विकल्प दे सकती है।
अग्निपथ योजना पर क्यों है मतभेद?
मामले का दूसरा पक्ष अग्निपथ योजना की सेवा शर्तों से जुड़ा है। पुरानी व्यवस्था में सैनिक लंबे समय तक सेवा कर सकते थे और पात्रता के अनुसार पेंशन सहित दीर्घकालिक लाभ हासिल कर सकते थे। अग्निपथ व्यवस्था में अधिकांश अग्निवीर चार साल बाद सेवा से बाहर हो जाते हैं, जबकि करीब एक चौथाई को नियमित सेवा में शामिल करने का प्रावधान है।
इसी वजह से नेपाल में इस बात पर बहस रही है कि चार साल की सेवा नेपाली युवाओं को पर्याप्त दीर्घकालिक आर्थिक और करियर सुरक्षा देती है या नहीं।
दूसरी ओर, भारत ने अग्निपथ को सशस्त्र बलों में युवा प्रोफाइल बनाए रखने और सैन्य मानव संसाधन व्यवस्था में बदलाव की व्यापक नीति के रूप में पेश किया है। ऐसे में नेपाली गोरखा भर्ती के लिए अलग शर्तें लागू करने का सवाल दोनों देशों के बीच बातचीत का विषय बन सकता है।
सेना प्रमुख की नेपाल यात्रा से पहले प्रदर्शन का महत्व
पोखरा का प्रदर्शन ऐसे समय हुआ है जब भारतीय सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ की नेपाल यात्रा निर्धारित है। इसलिए पूर्व सैनिकों की मांग को अतिरिक्त कूटनीतिक महत्व मिल गया है।
भारत और नेपाल के सैन्य संबंधों की एक विशेष परंपरा भी है, जिसमें दोनों देशों के सेना प्रमुखों को एक-दूसरे की सेना में मानद जनरल का दर्जा दिया जाता रहा है।
ऐसे में गोरखा भर्ती का प्रश्न रोजगार नीति के साथ-साथ भारत-नेपाल के ऐतिहासिक रक्षा संबंधों से भी जुड़ा हुआ है।
संतुलित विश्लेषण
पूर्व गोरखा सैनिकों का प्रदर्शन दिखाता है कि भर्ती का लंबे समय तक रुका रहना नेपाल के कुछ समुदायों के लिए आर्थिक और सामाजिक चिंता बन चुका है। भारतीय सेना में सेवा उनके लिए केवल नौकरी नहीं बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सैन्य परंपरा भी रही है।
हालांकि, नेपाल सरकार की चिंताओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अग्निपथ के तहत चार वर्ष की सेवा और सीमित स्थायी नियुक्ति पुरानी भर्ती व्यवस्था से बड़ा बदलाव है। इसलिए किसी समाधान के लिए दोनों देशों को भर्ती की कानूनी स्थिति, सेवा शर्तों, भविष्य की नौकरी और नेपाली युवाओं की सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सहमति तलाशनी होगी।
यदि भारत और नेपाल इस मुद्दे पर स्वीकार्य रास्ता निकालते हैं तो इससे नेपाली युवाओं के लिए रोजगार का एक पुराना विकल्प वापस आ सकता है और दोनों देशों के सैन्य संबंधों को भी मजबूती मिल सकती है। वहीं समाधान नहीं निकलने की स्थिति में गोरखा भर्ती की ऐतिहासिक परंपरा धीरे-धीरे कमजोर पड़ने का जोखिम बना रहेगा।
