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सैलरी का 50% से ज्यादा किराए में खर्च करती हैं गुरुग्राम की महिला, फिर भी नहीं बदलना चाहतीं घर—बताई खास वजह

गुरुग्राम में काम करने वाली शक्ति धरनी पांडे ने सोशल मीडिया पर बताया कि उनकी स्कूल की सैलरी का 50% से ज्यादा हिस्सा घर के किराए में चला जाता है, लेकिन इसके बावजूद वह सस्ता घर लेने की योजना नहीं बना रही हैं। उनका कहना है कि कार्यस्थल से सिर्फ चार मिनट की पैदल दूरी पर रहने से उनका आने-जाने का समय और ऊर्जा बचती है, जिसे वह अपनी सुविधा, मानसिक शांति और दूसरे कामों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण मानती हैं।

सैलरी का 50% से ज्यादा किराए में खर्च करती हैं गुरुग्राम की महिला, फिर भी नहीं बदलना चाहतीं घर—बताई खास वजह
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द्वारा जीत निर्मल

स्रोत: Hindustan Times, based on Shakti Dharni Pandey’s Instagram video

आधी से ज्यादा सैलरी किराए में, फिर भी घर बदलने का इरादा नहीं

गुरुग्राम, 6 अक्टूबर 2026: आम तौर पर पर्सनल फाइनेंस की सलाह में लोगों को अपनी आय का बड़ा हिस्सा किराए पर खर्च करने से बचने को कहा जाता है। लेकिन गुरुग्राम में काम करने वाली शक्ति धरनी पांडे (Shakti Dharni Pandey) ने अपने लिए अलग प्राथमिकता चुनी है।

पांडे ने Instagram पर साझा किए एक वीडियो में कहा कि उनकी स्कूल की सैलरी का 50% से ज्यादा हिस्सा हर महीने किराए में चला जाता है। इसके बावजूद वह फिलहाल सस्ता घर खोजने या दूसरी जगह शिफ्ट होने की योजना नहीं बना रही हैं।

उनका तर्क सिर्फ बेहतर घर पाने का नहीं है। वह अपने ज्यादा किराए को समय, सुविधा, सुरक्षा और रोजाना की ऊर्जा बचाने की कीमत के रूप में देखती हैं।

यह कहानी सोशल मीडिया पर किए गए उनके व्यक्तिगत दावों पर आधारित है। Hindustan Times ने स्पष्ट किया है कि इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है और उसने पांडे से टिप्पणी के लिए संपर्क किया है।

ऑफिस से सिर्फ 4 मिनट की दूरी पर है घर

पांडे गुरुग्राम के एक स्कूल में काम करती हैं और उन्होंने बताया कि उनका स्पacious 1RK घर स्कूल से केवल चार मिनट की पैदल दूरी पर है।

इस नजदीकी का फायदा यह है कि वह क्लास के बीच मिलने वाले ब्रेक में भी घर आ सकती हैं, गर्म खाना खा सकती हैं और अपना बचा हुआ काम पूरा कर सकती हैं।

लेकिन इस सुविधा की आर्थिक कीमत काफी ज्यादा है। उनके मुताबिक, मकान का किराया उनकी स्कूल से मिलने वाली मासिक आय के आधे से भी अधिक है।

उन्होंने यह स्वीकार किया कि पारंपरिक वित्तीय नजरिए से इसे खराब फैसला माना जा सकता है।

सस्ता घर उपलब्ध था, लेकिन उन्होंने दूरी नहीं चुनी

पांडे के मुताबिक, उनके पास स्कूल से दूर जाकर कम किराए वाला घर लेने का विकल्प था। आसपास के किसी सस्ते इलाके में जाने से भी उनकी हाउसिंग कॉस्ट कम हो सकती थी।

उन्होंने इसके बजाय कार्यस्थल के बेहद करीब रहना चुना।

उनका कहना है कि इससे उन्हें सुबह जल्दी निकलने की जरूरत नहीं पड़ती और घर लौटने के लिए ऑटो या मेट्रो में लंबा समय नहीं बिताना पड़ता। रोजाना के आवागमन पर उनका पैसा भी नहीं लगता, हालांकि उन्होंने माना कि यह बचत अतिरिक्त किराए की पूरी भरपाई नहीं करती।

यानी यह फैसला सीधे तौर पर कम खर्च बनाम बेहतर रोजमर्रा की जिंदगी के बीच चुनाव है।

‘20s का पैसा खुद पर लगा रही हूं’

पांडे ने अपने फैसले को सिर्फ घर के खर्च के रूप में नहीं देखा।

उनका कहना है कि जिस पैसे को वह निवेश या SIP में डाल सकती थीं, उसका एक हिस्सा वह अपनी मौजूदा जिंदगी को आसान बनाने में खर्च कर रही हैं। उनके अनुसार, कम यात्रा के कारण बचने वाला समय और ऊर्जा उन्हें नई चीजें सीखने, वीडियो बनाने और दूसरे काम करने का मौका देते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि उनकी side income ज्यादा किराए के असर को कुछ हद तक संतुलित करने में मदद करती है। हालांकि रिपोर्ट में उनकी कुल आय, वास्तविक किराया या side income की निश्चित रकम नहीं बताई गई है।

इसलिए केवल “50% से अधिक सैलरी किराए में” वाली जानकारी से उनकी पूरी वित्तीय स्थिति का आकलन करना संभव नहीं है।

सोशल मीडिया पर क्यों छिड़ी बहस?

वीडियो सामने आने के बाद लोगों की प्रतिक्रियाएं बंटी हुई नजर आईं।

कुछ लोगों ने माना कि समय और मानसिक शांति की भी आर्थिक कीमत होती है, जबकि दूसरे लोगों ने आय का आधे से अधिक हिस्सा किराए पर खर्च करने को लंबे समय के लिहाज से महंगा फैसला बताया।

दोनों पक्षों के तर्क में एक महत्वपूर्ण अंतर है।

अगर केवल मासिक बचत देखी जाए तो कम किराया आकर्षक लग सकता है। लेकिन अगर सस्ता घर ऑफिस से काफी दूर हो, तो उसके साथ यात्रा का खर्च, ट्रैफिक में लगने वाला समय और रोजाना की थकान भी जुड़ सकती है।

दूसरी तरफ, ऑफिस के पास रहने से जीवन आसान हो सकता है, लेकिन बहुत ज्यादा किराया देने पर आपातकालीन बचत, निवेश और भविष्य के दूसरे वित्तीय लक्ष्यों के लिए कम पैसा बच सकता है।

गुरुग्राम में महंगे जीवन पर पहले भी हो चुकी है चर्चा

यह पहली बार नहीं है जब गुरुग्राम में रहने का खर्च सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हो।

जून 2026 में एक अन्य गुरुग्राम निवासी ने ₹40,000 की मासिक आय के साथ शहर में खाने और दूसरे खर्चों को संभालने की कठिनाई पर सवाल उठाया था। उसी साल एक अन्य 25 वर्षीय निवासी की ओर से ₹85,000 मासिक किराया बताए जाने पर भी ऑनलाइन बहस हुई थी। ये अलग-अलग व्यक्तियों के अनुभव हैं और इन्हें पूरे शहर के औसत खर्च का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।

फिर भी, ऐसी कहानियां एक व्यापक शहरी सवाल को सामने लाती हैं: क्या घर चुनते समय सिर्फ किराया देखना पर्याप्त है, या commute और quality of life को भी उसी गणना में शामिल किया जाना चाहिए?

क्या आधी सैलरी किराए पर खर्च करना सही फैसला है?

इसका एक सार्वभौमिक उत्तर नहीं है।

पांडे का फैसला उनकी अपनी परिस्थितियों और प्राथमिकताओं पर आधारित है। किसी दूसरे व्यक्ति के लिए यही अनुपात आर्थिक दबाव पैदा कर सकता है—खासकर तब जब उसके पास emergency fund, दूसरी आय या पर्याप्त बचत न हो।

इस मामले में भी पूरी वित्तीय तस्वीर सार्वजनिक नहीं है। इसलिए यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि उनका तरीका सामान्य रूप से बेहतर या खराब वित्तीय रणनीति है।

कहानी का ज्यादा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पांडे किराए को सिर्फ रहने की जगह की कीमत नहीं मानतीं। उनके लिए महंगा लेकिन पास का घर रोजाना के commute को हटाकर समय और ऊर्जा खरीदने का एक तरीका है।

क्यों वायरल हो रही है यह कहानी?

यह मामला युवा शहरी कर्मचारियों के सामने मौजूद एक वास्तविक trade-off को आसानी से समझने योग्य तरीके से सामने रखता है।

बड़े शहरों में कोई व्यक्ति कम किराए के लिए ऑफिस से दूर रह सकता है, लेकिन उसे हर दिन यात्रा में अतिरिक्त समय देना पड़ सकता है। दूसरा व्यक्ति ज्यादा किराया देकर कार्यस्थल के पास रह सकता है, लेकिन उसकी बचत घट सकती है।

पांडे ने दूसरा विकल्प चुना है—और फिलहाल उनका कहना है कि वह इसे बदलना नहीं चाहतीं।

उनका अनुभव कोई व्यक्तिगत-वित्त नियम स्थापित नहीं करता, लेकिन इसने एक दिलचस्प सवाल जरूर उठाया है: हर महीने बचाए गए पैसे और हर दिन बचाए गए समय में किसकी कीमत ज्यादा है?

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