विज्ञापन - शीर्ष बैनर
Read in English —JantaScope English
वायरल

स्वतंत्रता दिवस की सीटिंग पर राहुल गांधी-खरगे थे ‘असंतुष्ट’, सरकार ने UPA दौर का रिकॉर्ड दिखाकर दिया जवाब: सूत्र

स्वतंत्रता दिवस समारोह में विपक्ष के शीर्ष नेताओं की सीटिंग व्यवस्था को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे व्यवस्था से संतुष्ट नहीं थे। दूसरी ओर, सरकार की ओर से UPA शासनकाल के उदाहरण सामने रखकर कहा गया कि उस समय भी BJP के विपक्षी नेताओं को इसी तरह की सीटिंग व्यवस्था में स्थान दिया गया था।

स्वतंत्रता दिवस की सीटिंग पर राहुल गांधी-खरगे थे ‘असंतुष्ट’, सरकार ने UPA दौर का रिकॉर्ड दिखाकर दिया जवाब: सूत्र
विज्ञापन

द्वारा जीत निर्मल

स्रोत: News18

नई दिल्ली: 15 अगस्त के स्वतंत्रता दिवस समारोह में विपक्ष के नेताओं के बैठने की व्यवस्था एक बार फिर राजनीतिक बहस का विषय बन गई है। मीडिया रिपोर्ट्स में सूत्रों के हवाले से कहा गया कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सीटिंग व्यवस्था को लेकर ‘असंतुष्ट’ या ‘असहमत’ थे।

यह विवाद इसलिए भी अहम है क्योंकि स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय समारोह में संवैधानिक और राजनीतिक पदों के अनुरूप बैठने की व्यवस्था को प्रतीकात्मक सम्मान से जोड़कर देखा जाता है। कांग्रेस की नाराजगी के बीच सरकारी पक्ष ने पूर्ववर्ती UPA सरकार के समय की मिसालों का हवाला देकर अपने फैसले का बचाव किया।

सरकार ने UPA दौर के उदाहरणों का दिया हवाला

रिपोर्ट के अनुसार, रक्षा मंत्रालय की ओर से पुराने रिकॉर्ड का संदर्भ देते हुए बताया गया कि UPA शासनकाल में भी BJP के विपक्षी नेताओं को हमेशा सबसे आगे की पंक्ति में जगह नहीं मिली थी। सरकारी पक्ष का तर्क है कि मौजूदा व्यवस्था को राजनीतिक अपमान के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए और सीटिंग में प्रोटोकॉल तथा उपलब्ध स्थान जैसे पहलू भी भूमिका निभाते हैं।

इस जवाब का राजनीतिक संदेश स्पष्ट है—सरकार यह दिखाना चाहती है कि जिस व्यवस्था पर आज सवाल उठ रहे हैं, उसके समान उदाहरण पिछली सरकारों के कार्यकाल में भी मिलते हैं।

राहुल गांधी की सीटिंग पहले भी बनी थी विवाद का मुद्दा

यह पहला मौका नहीं है जब स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में राहुल गांधी की सीट को लेकर चर्चा हुई हो। 2025 के समारोह में उन्हें कथित तौर पर पांचवीं पंक्ति में स्थान दिए जाने पर सवाल उठे थे। इस साल समारोह से पहले रक्षा सचिव आर.के. सिंह ने कहा था कि लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष को आधिकारिक वरीयता क्रम के अनुसार केंद्रीय कैबिनेट मंत्रियों के बाद बैठाया जाएगा।

इसी वजह से 2026 की सीटिंग व्यवस्था पर राजनीतिक नजर पहले से ही बनी हुई थी।

विवाद क्यों महत्वपूर्ण है?

मामला केवल कुर्सी या पंक्ति का नहीं है। संसद में नेता प्रतिपक्ष सरकार के प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी होने के साथ एक महत्वपूर्ण संस्थागत पद पर भी होता है। लोकसभा में राहुल गांधी और राज्यसभा में मल्लिकार्जुन खरगे विपक्ष का नेतृत्व करते हैं।

इसलिए राष्ट्रीय आयोजनों में उन्हें मिलने वाला स्थान राजनीतिक प्रतीकवाद का हिस्सा बन जाता है। विपक्ष यदि इसे पद की गरिमा से जोड़ता है, तो सरकार प्रोटोकॉल और पूर्व उदाहरणों के आधार पर व्यवस्था का बचाव कर सकती है।

कांग्रेस और सरकार के नजरिए में अंतर

कांग्रेस की ओर से इस मुद्दे को विपक्ष के नेताओं को मिलने वाले सम्मान के व्यापक सवाल से जोड़ा जा सकता है। पार्टी का तर्क यह हो सकता है कि राष्ट्रीय समारोहों में प्रमुख संवैधानिक और संसदीय पदों की गरिमा स्पष्ट रूप से दिखाई देनी चाहिए।

वहीं सरकार का जवाब ऐतिहासिक उदाहरणों पर केंद्रित है। UPA दौर की सीटिंग व्यवस्था का रिकॉर्ड सामने रखकर यह तर्क दिया जा रहा है कि मौजूदा व्यवस्था को केवल राजनीतिक भेदभाव के प्रमाण के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।

संतुलित विश्लेषण

स्वतंत्रता दिवस किसी एक राजनीतिक दल का कार्यक्रम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय समारोह है। इसी कारण ऐसे आयोजनों में प्रोटोकॉल से जुड़ा छोटा विवाद भी बड़ी राजनीतिक बहस बन सकता है।

यदि निर्धारित वरीयता क्रम मौजूद है, तो उसका स्पष्ट और समान रूप से पालन ऐसी बहसों की गुंजाइश कम कर सकता है। दूसरी ओर, पुरानी सरकारों के उदाहरण मौजूदा फैसले को संदर्भ जरूर देते हैं, लेकिन वे अपने आप यह तय नहीं करते कि वर्तमान व्यवस्था सबसे उपयुक्त थी या नहीं।

विवाद का बड़ा पहलू यही है कि सत्ता और विपक्ष दोनों राष्ट्रीय संस्थाओं तथा प्रमुख संसदीय पदों के सम्मान को किस तरह परिभाषित करते हैं। पारदर्शी और लगातार लागू होने वाला प्रोटोकॉल भविष्य में ऐसे राजनीतिक टकरावों को कम करने में मदद कर सकता है।

साझा करें
विज्ञापन - मध्य लेख
विज्ञापन - नीचे