कर्नाटक के छोटे से गांव की प्रतिभा बनी देशभर में चर्चा का विषय
स्वरश्री हेगड़े कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले के होन्नावर तालुका के अडुकाला गांव की रहने वाली हैं।
उन्होंने 12 तालों के बोलों का उच्चारण करते हुए उन्हें तबले पर बजाने की क्षमता दिखाई। इसी उपलब्धि को इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में मान्यता मिली है।PTI की 26 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, उन्हें इस विशिष्ट श्रेणी में सबसे कम उम्र की तबला कलाकार के रूप में मान्यता दिए जाने की जानकारी सामने आई है। स्वरश्री का यह प्रदर्शन इसलिए भी विशेष है क्योंकि विभिन्न तालों को पहचानने, याद रखने और उन्हें वाद्ययंत्र पर प्रस्तुत करने के लिए एकाग्रता तथा अभ्यास की जरूरत होती है।
एक साल की उम्र से ही तबले से था खास लगाव
स्वरश्री के माता-पिता के अनुसार, संगीत में उनकी दिलचस्पी बहुत छोटी उम्र से दिखाई देने लगी थी। जब वह लगभग एक साल की थीं, तब घर में रखा तबला उन्हें दूसरे खिलौनों से ज्यादा आकर्षित करता था। वह अक्सर तबले पर हाथ रखतीं और उससे अलग-अलग आवाजें निकालने की कोशिश करती थीं। कई बार वह तबले के पास ही सो जाती थीं। परिवार ने उनकी इस स्वाभाविक रुचि को पहचाना और उनके छोटे हाथों के अनुसार दो विशेष आकार के तबले तैयार करवाए। इस तरह खेल-खेल में शुरू हुआ संगीत से परिचय धीरे-धीरे उनकी पहचान बन गया।
पिता तबला वादक, मां हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायिका
स्वरश्री के पिता गुरुराज हेगड़े एक प्रशिक्षित तबला वादक हैं। वह प्रसिद्ध संगीत विद्वान शेषाद्रि अयंगर के शिष्य रहे हैं। उनकी मां श्रीलता अंग्रेजी की प्रोफेसर होने के साथ हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की गायिका भी हैं। दोनों मिलकर होन्नावर में एक संगीत विद्यालय चलाते हैं, जहां विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा दी जाती है। घर और संगीत विद्यालय का यह वातावरण स्वरश्री के लिए सीखने का स्वाभाविक माध्यम बन गया। उन्हें बचपन से ही तबले की ध्वनि, तालों के बोल और विद्यार्थियों के अभ्यास को सुनने का अवसर मिला।
पिता की क्लास में बैठकर सीखे 12 ताल
स्वरश्री की मां श्रीलता ने बताया कि जब गुरुराज अपने विद्यार्थियों को तबला सिखाते थे, तब उनकी बेटी पास बैठकर ध्यान से देखती और सुनती थी।धीरे-धीरे उसने तालों के बोल दोहराना शुरू किया और फिर उन्हें तबले पर बजाने का अभ्यास करने लगी। शुरुआत में वह कुछ छोटे तालों को समझने लगी थी। बाद में उसकी क्षमता बढ़ी और वह 12 ताल प्रस्तुत करने लगी। माता-पिता ने उसकी रुचि को देखते हुए सीखने की प्रक्रिया में सहयोग दिया। उनका मानना है कि लगातार संगीत सुनने और परिवार से मिले मार्गदर्शन ने बच्ची की प्रतिभा विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
तबले पर 12 ताल बजाना क्यों है खास उपलब्धि?
भारतीय शास्त्रीय संगीत में ताल का विशेष महत्व है। ताल एक निश्चित लयबद्ध चक्र होता है, जिसके आधार पर गायन और वादन की गति व्यवस्थित की जाती है। तबले में अलग-अलग प्रकार के बोल होते हैं, जो हाथों और उंगलियों के विशिष्ट प्रहारों से उत्पन्न ध्वनियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। किसी ताल को बोलकर सुनाना और उसी क्रम में तबले पर बजाना दो संबंधित लेकिन अलग कौशल हैं। इसमें स्मरण शक्ति, हाथों का नियंत्रण और लय की समझ आवश्यक होती है। स्वरश्री की उपलब्धि इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि उन्होंने तीन साल की उम्र पूरी होने से पहले 12 तालों के बोलों का उच्चारण और वादन प्रस्तुत किया है।
सितंबर में मिली रिकॉर्ड की मान्यता
स्थानीय कन्नड़ समाचार पत्र कन्नड़ प्रभा की 24 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, स्वरश्री की उपलब्धि को 25 सितंबर 2026 को इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में सत्यापित किया गया था। उस रिपोर्ट में रिकॉर्ड की पुष्टि के समय उनकी उम्र 2 साल 9 महीने बताई गई थी। वहीं अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में प्रकाशित PTI और अन्य रिपोर्टों में उनकी उम्र 2 साल 10 महीने दर्ज है। इससे स्पष्ट होता है कि उपलब्धि की मान्यता और व्यापक मीडिया चर्चा अलग-अलग समय पर सामने आईं। इस प्रकार यह अक्टूबर में दर्ज किया गया कोई नया रिकॉर्ड नहीं, बल्कि पहले मान्यता प्राप्त उपलब्धि की हालिया वायरल खबर है।
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ स्वरश्री का वीडियो
24 अक्टूबर को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर स्वरश्री की तबला प्रस्तुति का वीडियो साझा किया गया, जिसके बाद उनकी प्रतिभा व्यापक चर्चा में आ गई। वीडियो पर कई उपयोगकर्ताओं ने बच्ची की एकाग्रता और लय की समझ की प्रशंसा की। कुछ लोगों ने इस उपलब्धि को उत्तर कन्नड़ और कर्नाटक के लिए गर्व का अवसर बताया। वहीं कुछ ने भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में परिवार की भूमिका की सराहना की।
माता-पिता के लिए गर्व का पल
स्वरश्री की उपलब्धि पर उनके माता-पिता ने खुशी व्यक्त की है। मां श्रीलता के मुताबिक, बेटी की रुचि देखकर उन्होंने उसे प्रोत्साहित किया और संगीत सीखने का अवसर दिया। परिवार को उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में स्वरश्री अपनी इच्छा और रुचि के अनुसार संगीत की शिक्षा जारी रखेंगी। उनकी कहानी यह भी दिखाती है कि बच्चों की स्वाभाविक रुचि को पहचानना और उन्हें अनुकूल वातावरण देना कितना महत्वपूर्ण हो सकता है।हालांकि इतनी छोटी उम्र में किसी उपलब्धि के बाद भविष्य के करियर के बारे में निश्चित अनुमान लगाना उचित नहीं होगा।
